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दरिद्रता : दस प्रकरण कवि-विनोदविक्रम केसी

 

कविता-दरिद्रता : दस प्रकरण
कवि-विनोदविक्रम केसी

१.
मेरी मां का एक छोटा सा नाम सिसकारी भी है
मेरी मां का थोडा सा नाम आंसू है
मेरे बदरंग कमीज में
नजर गडाने के बाद
उनके चेहरे की झुर्रियों मे
झलकने वाली उदासी भी
उन्हीं का नाम है

पर,
मेरी मां का नाम दरिद्रता नहीं है ।

२.
राशिफल पढ रहा मेरा
एक जवान दोस्त !
निश्चिंत रहो,
आज भी तुम्हारे भाग्य में
स्वादिष्ट भोजन अर्थात्
चिकन विरयानी खाना
नहीं लिखा है,
अफशोस,
अपनी निरीहता का निदान ढुंढता
तुम्हारा यह तरिका दरिद्र है ।

३.
तुम्हारा मीठा प्यार—
ओश में नहा कर
मुरझाया हुआ राई का
साग जैसा ही मीठा
तुम्हारा यह मृदुल प्रेम
जब तक मिलता रहेगा,
तब तक मैं काट सकता हूं
भूख की अनगिनत रात ।

तुम्हारी यह नरम-गरम प्रेम—
एक दुःखी को दुसरे दुःखी से
मिलने वाले भरोसा जैसा मृदुल—
तुम्हारे मृदुल प्रेम के बदले में
मैं पुराने स्वेटर, उतरन के ज्याकेट
और मफलर पर ही
मैं गुजार सकता हूं जाडे
की ठिठुरन भरी स्याह रात ।

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४.

ईस शहर की दरिद्रता
उस चीडिया से ज्यादा
और किसको मालूम होगा ?
जो तिनके और घाँस के बदले
तार से गूँथ रही है अपना घोसंला
ईन शहर वालों के चोंचले है
गजब के—
चीडिंयों के कलरव के बीच
सुबह के चाय का आनन्द !

उस चीडिया की लडाई मे
सामिल होने की
फुर्सत या जरूरत
नहीं है उन दरिद्रों को !

५.
उसले लालित्य में ढाल कर क्या खूब कहा—
(देश का बहुत बडा भयङ्कर कवि है न वो )
‘उत्सव मनाओ अपनी गरिबी का
ईसमें मजा है, आनंद है, सुख है
शांति है, चैन है, नींद है’

उसकी बर्बर रोमान्टिसिजम मैं
खाली और भूखे पेटों का एक ही मन्तव्य है,
एक ही वक्तव्य है—
‘जो हुकुम हुजुर ।’

साथ में, नत्थी किया हुआ है
मध्यमा उगंली का शानदार अभिवादन !

६.
ओ माताओं !
आपका फैसला करने का समय
अब आ गया,

ईतने संकट ग्रस्त घडी ईस से पहले
मातृत्व के ईतिहास में
कभी नहीं आया था,

अपना इमान बचाने, सत्य को बचाने
गरिबी के जंगल मे
खोए अपने बच्चों को देख कर
तुम गर्व से सीना चौडा करोगी
या,
आंख को दरिया बनाओगी ?

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७.
सुपर मार्केट में घुसना
बधशाला घुसने के बराबर है,

यंहा पर हरेक सामान हाथ में चक्कू ले कर
आपकी खातिरदारी करने के लिए प्रतीक्षारत है
हम गर्दन आगे कर देते हैं,

खचाखच भरे हुए हैं सुपर मार्केट के तख्त,
हमारे मन का तख्त भी
कंहा खाली है ?
जख्म और दर्द से भरे हुए हैं तख्त ।

८.
कभी सोचा है आपने ?
ईस दरिद्र देश के
प्रधानमंत्री के रसोई में क्या–क्या पकता होगा ?

किसी दिन—
जब चावल–दाल–आटा–नमक–तेल सभी ने
जब मेरी रसोई से संवंध विच्छेद किया था,
तब
मै बहुत देर ईसी प्रश्न के
उहापोह में उलझा रहा था,

और, भुखे पेट
बहुत देर तक सोचने के बाद
मुझे मीला था यह जवाब—
कि प्रधानमंत्री के रसोई में
चौरासी की बजाय पचासी व्यञ्जन पकता है,

और उस नंए
पचासिवां व्यञ्जन का नाम है— ‘खुनांसू’
अर्थात्, खुन और आंसू ।

मैं आपसे और एक ज्ञान
बांटना चाहता हुं,
कि
यह प्रधानमंत्री का
सब से प्रिय परिकार है । 💐👍

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९.
प्रत्येक पांच साल में एक बार
लोकतन्त्र का महाभोज होता है

जीस में चांदनी की ग्रैवी में
चन्द्रमा की रोटी डूबा कर
तारों के भात के साथ
खाते है हम आश्वासनों की मिठी चटनी,

उसके बाद सहस्र स्वस्तिक छाप
लगा कर या ईविएम मेशिन का
बटन दबा कर
भरे पेट से कसमसाते हुए
हमारा लोकतंत्र एक लंबी डकार लेता है ।

१०.
चोर ने न्यायाधीश से कहा—
‘मुझे दरिद्रता ने चोर बनाया
मेरी हालात मे मेरी जगह
आप होते तो
चोर ही होते’

न्यायाधीश ने आंखे तरेर कर कहा—
‘हिन्दी फिल्म के सस्ते डायलग पसंद नहीं है मुझे
मै पनि दरिद्र ही था,
दरिद्रता से लड कर, उसको जित कर यंहा तक पहुंचा हूं मैं,

जेल जाने से पहले अपनी सफाई में अंतिम वाक्य में चोर बोला—
‘माई लर्ड ! मै इमानदारी पूर्वक लडा था ।’
ooo

कवि-विनोदविक्रम केसी

 

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