दो महान अख्यानात्मक कृतियां : रामदयाल राकेश
डॉ रामदयाल राकेश, हिमालिनी अंक अगस्त । २१वीं सदी में दो आख्यानात्मक कृतियां आयी हंै, जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । दोनों कृतियों में राम और जगतजननी जानकी के जीवन चरित्र का सफल चित्रण हुआ है । ये दोनों कृतियाँ हैं, ‘सीता के जाने के बाद राम’ और ‘तृन धरी ओट’ । ‘सीता के जाने के बाद राम’ के लेखक हैं, डॉ. अशोक शर्मा और ‘तृन धरि ओट’ की यशस्वी लेखिका हैं, डॉ. अनामिका । एक में राम का मानवीकरण किया गया है तो, दूसरी में सीता का ।
‘सीता के जाने के बाद राम’ उपन्यास में राम की मानव के रूप में मनःस्थिति का चित्रण अपने मन की अनुभूति के आधार पर किया गया है । डॉ. अशोक शर्मा ने बताया है कि सीता के प्रयाण के बाद किन मनःस्थितियों से होकर गुजरे होंगे । इस उपन्यास में एक पुरुष लेखक ने पुरुष की कोमल भावनाओं को किस प्रकार उकेरा है, इसका एक दृष्य प्रस्तुत है–
“जीवन कितना अधूरा सा हो गया है, उन्होंने आँखें बंद करते हुए पलकें कुछ मींची, होठ थोड़े तिरछे किए, फिर बाएं हाथ की हथेली ऊपर उठाकर आसमान की ओर कर ली और एक बार फिर एक पीड़ा भरी हँसी, और फिर आँखें खोल दी ।” प्रो. खेम सिंह, उहोरियाः गगनाचल १२वां विश्व हिन्दी सम्मेलन– २०२३ ।
सीता के चिर विरह में राम कितने उदास हैं, कितने गमगीन हैं, इसका वर्णन बड़ी बखूबी के साथ किया गया है । राम के मन में कितनी व्यग्रता है ? व्याकुलता है, सीता के विरह में उन्हें सीता की उपस्थिति का आभास होने लगता है, आसमान में उड़ते एक पक्षी की चीख में उन्हें अनुमान होने लगता है कि सीता भी इसी पक्षी की तरह चीखती होगी, उनके विरह में । राम को सहसा ध्यान में आया कि जब सीता के सतीत्व पर ऊंगली उठी तो वह कितनी मर्माहत हुई । वह कितनी आहत हुई और सहसा यज्ञस्थल से अज्ञात दिशा की ओर चल दी । लेकिन राम को ऐसा आभास होता रहता है कि सीता उन्हीं के इर्दगिर्द कहीं हैं । राम एक साधारण मानव की तरह अपने मन में उठी भावनाओं को अभिव्यक्ति में ऐसा बारम्बार प्रकट करते रहते हैं । उन्होंने कहा तुम मेरे पास नहीं आ सकती तो क्या हुआ, मैं तुम्हारे पास आ ही सकता हूँ । फिर तुम्हारा घना साया खो गया है और मैं इस धूप में फिर से अकेला ही खड़ा हूँ । फिर राम को स्मरण हुआ, जब जनकपुर में अवस्थित जनकवाटिका में उनका प्रथम दर्शन हुआ था ।
सीता की निष्ठा पर राम को कोई आशंका नहीं थी, फिर भी लोकलाज, मर्यादा की रक्षा के लिए उन्हें सीता का परित्याग करना पड़ा । यह राम के लिए बहुत दुखदायी साबित हुआ । उन्होंने उद्घोष किया कि सीता तो केवल प्रेम और विश्वास है । अतः उसकी निष्ठा पर कोई उंगली उठा नहीं सकता लेकिन सामाजिक मर्यादा के कारण सीता को अश्वमेघ यज्ञ के समय जो घटना घटी, उससे राम कम मर्माहत नहीं हुए थे । यह नियत का खेल था जो बहुत ही पीड़ादायक प्रमाणित हुआ । सीता को जीवन भर अनेक पीड़ाएं सहनी पड़ी । इसलिए तो कहा जाता है कि सीता ने लोक के लिए प्रेम को भुला दिया और राधा ने प्रेम के लिए लोक को भुला दिया । सीता आजीवन पीड़ा ही पीड़ा भोगती रही । फिर भी कभी राम को बदनाम नहीं होने दिया । उन्हें अग्निपरीक्षा भी देनी पड़ी । लेकिन उन्होंने आह तक नहीं भरी ।
राम सीता की अनुपस्थिति में बरसात में भीगते रहे लेकिन उन्हें कोई कष्ट की अनुभूति नहीं हुई । उन्होंने कहा– सुख–दुःख किसे नहीं अनुभव होता है । मानव सुख–दुख, सब को भोगना पड़ता है । राम एक साधारण मानव के रूप में अपनी सुखानुरति और दुखानुभूति को सहते रहते हैं ।
अग्नि परीक्षा के समय में स्वयं अग्निदेवता प्रकट होकर सीता को ‘इर्मा भगवती लक्ष्मी’ कहकर सम्बोधित किया था । सीता सीता के कारुणिक जीवन का सबसे प्रभावशाली चित्र महाकवि भवभूति ने उत्तर राम चरित में चित्रित किया है । ‘हनुमन्नाटक’ में सीता स्वयंबर ‘राम सीता विवाह’ आ ‘सीताहरण’ में सीता के अप्रतिम और अलौकिक सौन्दर्य वर्णन मिलता है । राजा जनक के हलेष्टि यज्ञ में अग्निशिखा के सदृश्य जगत् जननी जानकी का प्रादुर्भाव हुआ और बाल्मीकी रामायण के उत्तरकाण्ड में ऐसा वर्णन मिलता है,
“एवमेष महाभागा मत्येषुत्पतस्य ते पुनः
क्षेत्र, हलमुखोत्कृष्टे वेदयामग्नि शिखायमा ।”
इस प्रकार जगतजननी जानकी सत्ययुग में ब्रह्मर्षि कुशध्वज की सुपुत्री के रूप में प्रकट हुई । त्रेता युग में दुराचारी और अत्याचारी रावण की हत्या करवाने के लिए मिथिलेश ‘सीरध्वज’ जनक के घर में सीता के रूप में आविर्भुत हुई ।
‘स्कन्दपुराण’ में ब्रह्मविद्या के साक्षात अवतार सीता को कहा गया है । संस्कृत काव्य में महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘रघुवंश’ में सीता को रामचन्द्र कि आदर्श सहधर्मिणी कहा है । महाकवि कालिदास ने अयोनिजा कहकर सीता को अभिहित किया है । आठवीं शताब्दी में रचित ‘कुमार दास’ की कृति ‘जानकी हरण’ का काव्य में सर्वप्रथम उनके जीवन के कारुणिक पक्ष का उद्घाटन किया है । अभिनव गुप्त कृत ‘रामचरित’ और क्षेमेन्द्र कृत ‘रामायण’ मजंरी आदि काव्यों में सीता चरित्र को पौराणिक परम्परा अनुसार ही चित्रित किया गया है । सतरहवीं शताब्दी में रचित ‘जानकी परिणय’ में उन्हें अत्यन्त रूपवती महालक्ष्मी स्वरूप में चित्रित किया गया है । भाषकृत ‘प्रतिमा अभिषेक’ नाटक में साक्षात लक्ष्मी को रूप में चित्रित किया गया है । नारद से लेकर आदि कवि बाल्मीकि, व्यास, पराशर, भवभूति, कालिदास, महाकवी आदि अनेक कवियों ने सीता की कथाओं को लिपिवद्ध किया है । महाकवी कालिदास ने ‘रघुवंश’ महाकाव्य में सीता को दैवी रूप में प्रतिष्ठापित किया है । ‘अध्यात्म रामायण’ में सीता को मूल प्रकृति की संज्ञा से विभूषित किया गया है । सीता के अनेक नाम है, यथा जानकी, मैथिली, जनकतनया, वैदेही, भूमिजा, जगत जननी और जगदम्बा आदि । महाकवि तुलसी दास के मतानुसार जगत जननी जानकी इस सृष्टि की उत्पत्ति करनेवाली, पालन करनेवाली और संहार करनेवाली मात्र न होकर सब तरह के कल्याण करनेवाली शक्ति है यथा–
“उद्भव स्थितिकारिणी कलेश हारिनीम्
सर्वेश्रेयसकरी सीता हंनतो डहं रामबल्लमाम् ।”
अशोक शर्मा ने अपने उपन्यास ‘सीता के जाने के बाद राम’ में राम मःनस्थिति की मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है । उन्हीं के शब्दों में–
‘सीते तुम इस आकाश में ही कहीं छिपी हो क्या ? उन्होंने मन ही मन कहा, फिर अपनी इस बात पर वे स्वयम् ही हँस पड़े ।’ जीवन कितना अधूरा सा हो गया है, सोचते हुए उन्होंने आँखें बंद करते हुए, पलकें कुछ भींची, होठ थोड़े तिरछे किए, फिर बाँए हाथ की हथेली कुछ ऊपर उठाकर आसमान की ओर कर ली और एक बार फिर एक पीड़ा भरी हंसी और फिर आँखे खोल दी ।
‘सीता के जाने के बाद राम’ उपन्यास में उपन्यासकार अशोक शर्मा ने राम को एक साधारण मानव के रूप में वर्णन किया है । राम एक सामान्य मानव के रूप में चित्रित है । जैसे– राम एक सामान्य मानव की तरह है, “जिनके मन पर हर स्थिति का प्रभाव पड़ता है, जिनको मानसिक पीड़ा भी होता है । राजनीति में वो सशक्त राजा हैं, जो बलशाली है, पर जन सामान्य में, मानव के रूप में, पति–पिता के रूप में हैं, जैसे संसारिक दुनियादारी के सामान्य जन होते हैं । कभी टूटते है, कभी बिखरते हैं, कभी सभंलते हैं । फिर हौसले से आगे बढ़कर धैर्यवान, शक्तिवान, सुन्दरशील रूप में आ जाते हैं । महाकवि बाल्मीकि ने भी राम को सामान्य मानव की तरह दिखाया है ।
उपन्यासकार अशोक शर्मा के शब्द में– “शब्द जिसके पुरुषार्थ का वर्णन करने में असमर्थ हो, उसके नेत्रों में आँसू, मेरा भ्रम तो नहीं है । सुख या दुख किसे नहीं व्याप्ते लक्ष्मण, और आँसू पी लेने की अपेक्षा कभी–कभी आँसू गिरा लेना शायद व्यक्ति के लिए अच्छा होता है, किन्तु किसी किसी को तो आँख में आंसू लाने की भी अनुमति नहीं होती । यह कितना त्रासद है ।”
सीता के जाने के बादः पृष्ठ ११
समीक्ष्य उपन्यास में राम, जो मर्यादा पुरुष कहे जाते हैं, जो आदर्श राजा कहे जाते हैं । इनके राज्यकरण को रामराज्य कहा जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है–
“दौहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य काहू नहीं व्यापा ।” ऐसे राम को भी सीता का बिछोड़ को दुःख सहने में कितना कष्ट हुआ । सीता की अनुपस्थिति में राम के मनोवैज्ञानिक मनस्थिति का वर्णन करने में उपन्यासकार को सफलता मिली है । उपन्यासकार अशोक शर्मा ने राम के चरित्र का आख्यानीकरण करके एक महत्वपूर्ण कार्य किया है । अब तक राम के चरित्र का पद्यात्मक वर्णन करके कितनी रामायण को लिपिबद्ध किया गया है किन्तु प्रथम बार अशोक शर्मा ने गद्यात्मक वर्णन किया है । यह विद्वानों से लेखकर सहज, सरल और सीधे लोगों के लिए सम्प्रेषनीय है ।
दूसरे उपन्यास ‘तन घरी ओट’ में लेखिका अनामिका ने सर्वप्रथम सीता के आदर्शमय और त्यागमय चरित्र का अख्यानीकरण कर एक नया कीर्तिमान किया है । समीक्ष्य उपन्यास को अनामिका ने विभिन्न खण्डों में विभाजित कर सीता के महनीय चरित्र को गौरव गरिमा से मंडित किया है जैसे खण्ड १ में गुप्त पत्राचार, गुप्त पत्राचार धरती का जल से इसमें निष्कर्ष के रूप में कहा गया है–
“स्त्री देह के सौन्दर्य का तेज वहन कर पाने की योग्यता अर्जित करने में पुरुषों को अभी कई जन्म और लगेंगे ।” ‘हृदय का दर्पण’ जिसमें कहा गया है कि अगर मेरी बात काटकर तुम अपने विवेक से नहीं चलती और लक्ष्मण रेखा नहीं लांघती तो लंकादहन और रावण वध का वह महासंकल्प कैसे पूरा होता, जो मेरे जीवन का ध्येय था ।
‘एक पत्र लव–कुश को’ इसमें कहा गया है ‘दुनिया में कोई भी चीज, कोई घटना ऐसी नहीं होती, जिसका एक शुभ, एक शुभेतर पक्ष न हो । इसलिए समान भाव से सुखः दुःख देखने–झेलने का तर्क बनता है ।
‘रामराज्य की चुनौती’ शीर्षक में कहा गया है– “दैहिक–दैविक भौतिक तापों से जनजीवन मुक्त कर देने का संकल्प राम ने बहुत हद तक पूरा किया, पर पूर्णता पूर्णचन्द्र की भाँति बहुत देर तक अचल रह नहीं पाती, यह तो सृष्टि की मूल विडम्बना रही ही है ।
‘शान्ति और प्रेम’ शीर्षक में यह उद्धृत किया गया है– “मैं शान्ति और प्रेम की स्त्री सम्यत उपाय राक्षस बच्चों पर आजमाना चाहती हूँ ! सुशिक्षा की आँच में ही इनकी हिंस्रक वृतियाँ हमेशा के लिए गलेंगी !’
‘मातृत्व’ शीर्षक में यह मर्म व्यक्त किया गया है–
“युद्धक्लान्त और स्वार्थाकान्त इस आवेग–शासित धरती पर किसानों के धैर्य से प्रेम और शान्ति की हरीतिमा संचारित करना जरूरी है ।”
‘मिथिला’ शीर्षक में ‘हर चुनौती एक अवसर भी है– अपनी प्रच्छन्न संभावनाएं दर्द निकाले का अवसर स्वयं को दुबारा जन्म देने का अवसर ! सन्तान की जन्म माा का नयाँ जन्म तो है ही ।
‘वैद्यराज’ शीर्षक में लिखिका ने यह भाव व्यक्त किया है– “बच्ची को उसकी दादी की गोद में लिटाकर उन्होंने भेंगेरिया का रस सुँघाया, कुछ पंख झेला पर बच्ची इतना डर गयी थी कि होश आने पर भी आँख खोलने को तैयार नहीं थी ।”
‘असल समाधान’ शीर्षक में यह महान भाव अभिव्यक्ति है– युद्ध और हिंसा तत्कालिक राम भले कर दें दुवृतियों का, उसका दुष्ट चक्र नहीं तोड़ पाते । असल समाधान तो बच्चे का संस्कार–प्रक्षालन है, जो अच्छी परवरिश और सदीक्षा से ही संभव है ।
‘मैं भूमिजा’ शीर्षक में यह सूत्र वाक्य है– “आँख मूँदकर तो मैंने अपने राम की या किसी और की बाते मानी ही नहीं । हमेशा ही तर्क किया– कभी बोलकर, कभी चुप रहकर !
खण्ड–२
सीतायन ः कुछ क्षण–चित्र (सीता की पाण्डुलिपि) बालकाण्ड पचपन–बालकाण्ड होगा, पर ‘बालिका काण्ड’ जैसा पद तो अवधारणा के इतिहास में नहीं है । ऐसा नहीं कि कोई काण्ड करती नहीं बलिकाएं ! मैंने भी कुछ तो किया ही– इसमें लेखिका की आत्मस्वीकृति अभिव्यक्त हुई है ।
‘शास्त्रार्थ’ शीर्षक में मिथिला की विशेषताओं को उजागर किया गया है, जैसे मिथिलाञ्चल में जैसे बादल, बेमौसम, बात–बेबात घिर आते हैं, ऋषियों की जमात भी सहज भाव से जुटती रहती है !
‘बाप–बेटी’ शीर्षक में विषम परिस्थितियाँ बारिश की वह तेज दस्तक है, जिससे धरती हुए मन में तीन तरह के बीज चटकते हैं ।
‘माँ–बेटी’ शीर्षक में ‘तुलिका उठाकर हम अपने ही ढंग से कोई ऐपन बनाते हैं, हर स्त्री अपने ही ढंग से इसका एक उत्तर पाती है, अपने जीवन में ।’
‘पुष्पवाटिका’ शीर्षक में यह भाव व्यक्त किया गया है कि स्वयंवर का निमन्त्रण उनके बच्चोें के लिए भेजूँ और उसी अन्य मानसिकता में वे किसी राह चलते सिद्ध का धनुर्भंग की खातिर भेज दें तो बेटी–गरीब के घर भी जा सकती है । निर्धन घर सिद्धान्तों का भी हो तो वहां बहु लगातार खटती ही रहती है । घर के कार्यों से मुक्ति मिले तो प्रतिभा किसी और ठौर खिले ।
‘धनुर्भंग’ शीर्षक में यह गहन भाव व्यक्त किया गया है– “दम्भ और आशंका के बीच झूलता हुआ आदमी जितना दयनीय दीख सकता है, वे दीख रहे थे ।”
अयोध्याकाण्ड
रीतियाँ–नीतियाँ में यह भाव व्यक्त किया गया है– “आप भूल रहे हैं । आर्यपुत्र, एक कमनीय स्त्री काया में आरूढ है आपकी सिया और संसार अभी इस योग्य नहीं हुआ कि एक कमनीय स्त्री काया की ममता को ममता की तरह ही स्वीकारे । इसलिए प्रौढावस्था तक इसकी ममता तिनके की ओट लेकर ही लोकाविमुख हो । यह आवश्यक है ।
‘मंगल गान’ शीर्षक की शीर्ष पंक्तियाँ– ‘जो बस गया, समझे रच ही गया– हथेली की मेहंदी की तरह बल्कि उससे भी गहरा– किसी गोदने की तरह सिर्फ इसलिए कि वह कहीं और से आया है– कोई पराया नहीं होता । लोक गीत तो पथिकों से भी हृदय संवाद कर लेते हैं । इस चलायमान जगत् में कौन है, जो कहीं और से नहीं आया ?
‘विदाई’ शीर्षक में यह भाव व्यक्त किया गया है, “उड़ान और फैलाव कोई परिमिति नहीं मानते ! वे आकाश तत्व को निवेदित हैं, पर धरती पर डग धरते हैं तो नाप–नापकर ।”
‘नयी गृहस्थी के सुभग खटराग’ का गह भाव– ‘देह और दैहिक ऐश्वर्य से जुड़ी सब वस्तुएँ समाज के नियमों के अनुसार नियोजित हैं तो झमेले कम होते हैं वरना सारा जीवन अपने परिवेश से संघर्ष करने और उसके ताने सुनने में ही निकल जाता है ।
‘कैकेयी माँ से गदायुद्ध’ शीर्षक सोचमग्न बना देता है– “जब उनकी गदा उडकर दूर जा गिरी, पहले तो उन्होंने मेरी तरफ देखा, फिर उन सखियों की तरफ जो भय और चिंता के आवेग में अपनी रानी के वस्त्र और उनका मन व्यवस्थित करने इधर ही भागी आ रही थीं– ठीक वैसे जैसे किसी अनाम लक्ष्यधारी के वाण से डराया, विपरित दिशा में भागता हिरण दल !”
‘वन गमन की सूचना’ शीर्षक में यह सलाह दी गयी है– “किसी के दरकते दाम्पत्य को सहारा दों तो अपना दाम्पत्य भी रसावेग से भर जाता है ।”
‘तर्क बल्लरी’ शीर्षक मे यह तर्क प्रस्तुत किया गया है– “कैकेयी माँ के कोप भवन का प्रतिपक्ष है मेरे पास ! राजसी–तामसी हर कोप का एक सात्विक प्रतिपक्ष होता है और उस सबलतर प्रतिपक्ष का नाम है अहैतुक नहे ! अहैतुक नहे ही है, जो सृष्टि में चाँद–सूरज, फूल–तारे बनकर खिलता है, सात समुन्दर बन उमड़ता है ।”
‘उर्मिला’ शीर्षक में यह महान् विचार व्यक्त किया गया है– ‘अश्रपूरित आँखो से निष्पलक अपनी स्त्री की ओर देखता हुआ धीर पुरुष दुनिया का सबसे सुन्दर दृश्य होता है । यही वह क्षण होता है, जब उसका चेहरा सचमुच ही ईश्वर का चेहरा हो जाता है– धैर्य और ममता, शक्ति और करुणा का समतोल ।”
अरण्यकाण्ड
‘वन गमन’ शीर्षक विचारणीय है– “खिलौना पटककर तोड़ देनेवाले जिद्दी बच्चे का चिड़चिड़ा–सा एकान्त चारों तरफ उत्तरीय–सा ओढे हुए वे सबसे अलग–थलग ही खड़ी थी ।”
‘वन बधू’ शीर्षक की ये पंक्तिया ध्यातव्य है– “सुन भर ली और मन ही मन यही सोचती रही कि कैसा अजीब इनका बचपन बीता होगा या क्या उनकी विशषताएं रही होगी जो उनका मन इतना संकीर्ण हो गया उन स्त्रियों के लिए जिनका जीवन किसी कारण पटरी से उतर गया, उन जातियों और जनजातियों के लिए जिनके श्रम से इनका जीवन सुगम बना या फिर उनके लिए जिन्होंने एक वैकल्पिक जीवन आर्जित की ।
इसी अध्याय में एक बहुत बड़ी शिक्षा दी गई है– “भैया लखन, धरती मेरी माँ है, इस नाते आपकी भी और एक तरह से जीवन मात्र की माँ । धरा भेदन के भी इसी तरह हाथ जोड़ लेना चाहिए । आप को तो पता है, सुबह बिस्तर से उतरते धरती पर अपना भार भी यों ही नहीं रख देते– पहले उससे क्षमा मांगते हैं और उसका अभिवादन करते हैं । इस कृत्य से धरती का कुछ बनता–बिगड़ता नहीं, पर अपना हृदय कोमल बना रहता है । कोमलता और कृतज्ञता– ये दोनों भाव महाभाव है, जिनसे आत्मा परिष्कृत होती है और मनुष्य, मनुष्य बना रहता है ।”
‘वन बधू’ शीर्षक में यह कहा गया है कि सुन भर लीं और मन ही मन यही सोचती रही कि कैसे आजीवन इनका बचपन बीता होगा या क्या उनकी विशेषताएं रही होगी, जो उनका मन इतना संकीर्ण हो गया उन स्त्रियों के लिए जिनका जीवन किसी कारण पटरी से उतर गया । उन जातियों और जनजातियों के लिए जिनके श्रम से इनका जीवन सुगम बना या फिर उनके लिए जिन्होंने एक वैकल्पिक जीवन दृष्टि आर्जित की ।
‘मुक असहमतियाँ’ शीर्षक में आत्म संयम का पाठ सिखाया गया है, जैसे मानती हूँ, शारीरिक सम्बन्ध इधर–उधर जोड़ते चलने से समाज में अराजकता फैलेगी और यह बात पुरुष को भी उतने ही ध्यान से आत्मसात् करनी चाहिए, जितने ध्यान से स्त्री की शरीर और धन अराजक विनियोग की वस्तुएं नहीं है ।
‘दाम्पत्य की रसमल’ शीर्षक में शिक्षाप्रद नीति नियम की निष्पति पर विचार किया गया है । “वे दण्ड देते हुए भी क्रोध में नहीं भेदभाव में होते थे ! उनकी आँखों में करुणा की दीप्ति होती थी और दण्डित हो रहे व्यक्ति को भी साफ दीख जाता था कि यह घृणा या प्रतिशोध–वृत्ति से परिचालित न होकर मेरी कल्याण–कामना से सन्दीप्त हैं ।
‘भरत प्रसंग’ शीर्षक भी शिक्षाप्रद और ज्ञानप्रद है । “मातृछवि या पितृछवि खण्डित होना चित्त को कितना आघात देता होगा । जहाँ से विश्वास का स्रोत फूटता है, उसी गुफा के मुँह पर विषैली वनस्पतियाँ उग आएँगी तो गांव के लोग उधर देखना ही भूल जायें, यह स्वभाविक है ।
‘शूर्पणखा’ शीर्षक में यह भाव दर्शया गया है– “कितने कामना–कातर पुरुषों के प्राण निर्वहन, कुपात्रों के प्रण निवेदन हर स्त्री के आठ से अड़तीस बरस तक झेलने होते हैं, अगर वह सबके नाक–कान काटती चले तो अधिकतर पुरुष नकटे ही मिलें । कई बार समझाने–बुझाने–धमकाने–मटियाने से ही भेद सध जाता है, ऐसे प्रत्यक्ष और वीभत्स दण्ड की आवश्यकता नहीं पड़ती !
सुन्दरकाण्ड
सुन्दरकाण्ड का प्रारंभ अशोक वन से किया गया है । आश्चर्य में डूब गई यह देखकर की बचपन में राक्षस भी देव–शिशु जैसे ही प्यारे और सुन्दर होते हैं । क्रोध–काम–लोभ की लगाम छोड़ देने के प्रशिक्षण का परिणाम है बाद के दिनों की भयावहता ।
‘स्मृतियों में मारीच प्रसंग’ शीर्षक की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य है– “मगर अभी तो हम वनबास में हैं । राजधर्म या क्षात्रधर्म आपसे आपके राजवस्त्रों के साथ ही उतरवा लिया गया ! कोई भी धर्म या कोई भी जाति एक परिधान ही है और परिधान वृत्तियों की तरह ही बदल दिए जा सकते हैं ।”
‘राक्षस–पत्नियाँ’ शीर्षक में यह भाव व्यक्त किया गया है– “पुरुष अहंकार को विशेष ठेस पहुँचती है, जब कोई स्त्री उससे तर्क करें, खासकर वह स्त्री जो उसकी पालिता या रक्षिता है । और उसकी तिलमिलाहट का कोई पारावार नहीं रहता, जब स्त्री के तर्क उसे निरुत्तर करें ।”
‘स्मृतियों में अयोध्या’ राजभवन के बारे में यह भाव दर्शाया गया है– “मुझे याद आता राजभवन से विदाई का वह क्षण जब पूरी अयोध्या नगरी विषाद् में डूबी थी और हम अपने हिस्से का सारा धन प्रेमविह्वल नागरिकों के नाम करते हुए धीरे–धीरे आगे बढ़ रहे थे ।”
‘स्वर्ग नगरी’ शीर्षक में ध्यातव्य है– “मैं धरती की बेटी, फल ही मेरे लिए भी वरेण्य थे । रत्नजडित स्वर्ग मृत से खिलने का मोह साधा ही क्यों ? कहने को तो धरती भी रत्नगर्भा होती है और समुद्र सी, पर धरती के रत्नों की प्रकृति समुद्र के रत्नों से अलग है ? धरती के रत्न कस्तुरी मृग हैं– अपने वैभव से अनभिज्ञ !
‘स्मृति के झरोखों से लक्ष्मण रेखा’ शीर्षक ‘सीतायन’ पढने को आश्चर्य हो सकता है कि औलिया, अवधूत और पीर–पठान तो आगे की शताब्दियों में आए थे । त्रेता में सभ्यताएँ इतनी अधिक कहाँ घुली– मिली कि भाषा के कूप जल में उनकी छाह प्रकट हो ।”
‘रावण का रंगमहल’ शीर्षक में सीता को पूरा विश्वास था कि वह बहुत दिनों तक अपहृत अवस्था में नहीं रहेंगी और एक दिन अवश्यमेव आजाद होउंगी और हुआ भी ऐसा ही । लेखिका के शब्दों में– “जो कभी मिथ्यावाचन नहीं करती, उस जिह्वा में सत्य का ताप निवास करता ही है । इसी भरोसे मैंने इतना कहा और थककर माँ धरती की गोद में बैठ गयी ।”
‘स्त्री घास की तरह धरती पर उपजी’ शीर्षक में राक्षसी वृत्ति पर लेखिका मत मननीय है– ‘सीधे मुँह बोलने और सीधी–आँख से देखने का सहज प्रशिक्षण राक्षसों को नहीं मिलता या यो कहें कि जिन्हें सीधे मुँह बोलने और सीधी आँख देखने का सहज प्रशिक्षण नहीं मिलता, वे ही राक्षस हो जाते हैं ।”
‘मारुति नन्दन’ शीर्षक में वातावरण के प्रति सजगता का सन्देश दिया गया है, जैसे पेड़ किसी की बपौती नहीं होते, वे सिर्फ धरती की संतान होते हैं । इसमें लेखिका लाख टके की बात कही है– “भले ही, सोने की हो, चौसठ व्यंजनों से भरी हो, परोसने वाले के हृदय की कुटिलता भोजन विषाक्त कर जाती है । पृ. १३४
‘मंदोदरी माँ’ शीर्षक में मंदोदरी के मुँह से जब यह रहस्योदघाटन हुआ कि मैं रावण की पुत्री हूँ तो मै अवाक रह गयी, लेकिन सच यही था । लेखिका के इन पंक्तियों में ‘हां सीता, मैं ही वह अभिशप्त माँ हूं, जिनसे तुम्हें टोकरी में बन्द कर समुद्र की लहरों पर जोड़ दिया था । पहली संतान बेटी हों, यह रावण चाहते नहीं थे ।” पृ. १३५ इसतरह से विभिन्न शीर्षकों में विभक्त कर समीक्ष्य उपन्यास का कथानक बन गया है ।
इस क्रम में और भी शीर्षक महत्वपूर्ण है । जैसे आठ बरस की शांति । लंका दहन, शीर्षक में बहुत ही महत्वपूर्ण बात प्रकट हुई है । जैसे बहन के अपमान का प्रतिशोध पत्नी अपहरण से पूरा हुआ । अब युद्ध में दूसरे जीवों की बलि चढाने से अच्छा है कि महिमामयी सीता को आदरमान से बन्धन मुक्त किया जाए… प्रकृति रूप हैं वे और प्रकृति की बन्दी बनाने का स्वप्न भी अनिष्टकारी है ।
लंकाकाण्ड
इसमें युद्ध क्लान्त राम की मनःस्थितियों को दर्शाया गया है, क्योंकि राम भी अभी मानव शरीर में अवस्थित थे । यहाँ भी राम का मानवीयकरण किया गया है । इसके उपरान्त ‘निष्कृति’ खंड में अग्नि प्रसंग और अन्तिम । अन्तिम अध्याय में मिथिला के प्राचीन गौरव का गान इसतरह किया गया है–
“षडदर्शन और बारह ऋतुओं की यह रंग–रंगीली, रसीली, सजीली–सी, धरती हरी भरी है तो इस प्रसन्न, उपरचित्त बहुलता के कारण ही । सामान्य किसान और कारीगर भी यह दर्शन और कविता ही बाँचते दिखाई देते हैं । इसका कोई कारण तो होगा ही; वंशानुगत हो या परिवंशगत !” पृ. १५३
‘उत्तरायण’ खण्ड में अन्र्तयात्रा, अर्थ मार्तगी कथा, मन–वनः वृद्ध मार्तगी की कुटिया, वन भोज, स्थगन, दस बहनेः दस महाभाव, प्रसव पीड़ाः पुनरावलोकन, जंगल की बारिश, केवट प्रसगः उक्त कथा, वैदराज, सुतुपा, वापसः स्वय्म की ओर, आक्रान्ताः संशय की कटीली झाड़, बाबा शम्बूक नयी पाठशाला, अश्वमेघ के घोड़े, शम्बूक वध, राम के नाम अन्तिम पाती, सुर्पनखा को चिठ्ठी, अन्तिम पाती लव कुश के नाम और अंतिम तेरा तुझको सौर्यता ।
‘तेरा तुम को सौर्यता’ शीर्षक में लेखिका का आत्मस्वीकृति अभिनन्दनीय है–
“पिता जी ने जो ‘सीता’ महाकाव्य शुरु किया था, उसे पूरा करने की घड़ी आ गई है । समझती हूँ उपन्यास ही आधुनिक जीवन का महाकाव्य है, जैसे भी पूरा करो, चाहे उपन्यास रूप में पूरा करो– पर मेरे रहते–रहते ही इसे पूरा करके पाण्डूलिपी मेरे हाथ में दे दो ।’ पृ. २२०
लेखिका अनामिका के पिता थे श्यामनन्दन किशोर, जो हिन्दी भाषा साहित्य के मुद्र्धन्य कवि थे और मां आशा किशोर जो हिन्दी साहित्य की लब्धप्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखिका थीं । इस उपन्यास का अन्त पाठक को अभिभूत और अत्यन्त भावुक बना देते हैं, जैसे–
“सीता के अंतिम पत्र मां के प्रयाण के बाद लिखे और मुझे ऐसा लगता है, ये मैंने नहीं लिखे, उसने ही लिखवाए, जैसे बचपन में हाथ पकड़कर कर्सिब राइटिंग का अभ्यास कराती थीं, यह पूरा जीवन, दर्शन उसका ही तो था, तेरा तुझको सौर्यता का लागे है मोय ! पृ. २२ ।


