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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश देवता हैं ! : तेजेन्द्र शर्मा

 
(पुरवाई पत्रिका का यह संपादकीय किसी भी तरह से
भारत की सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने का प्रयास नहीं है।)
फ़िल्म घातक में सनी देओल का एक संवाद है – ‘कानून और इन्साफ़ ताकतवर के घर ग़ुलाम बन कर रहते हैं।’ पिछले ही वर्ष झारखंड हाई कोर्ट की बिल्डिंग के उद्घाटन पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, “कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी न्याय नहीं मिलता। कई लोगों की लिस्ट मेरे पास है।”
पिछले सप्ताह चर्चा हमने की थी हिन्दू विवाह में सात फेरों के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट की। एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट हमारे संपादकीय में घुसपैठ कर रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक विचित्र सा फ़ैसला सुनाया – एक राजनेता को चुनाव प्रचार के लिये अंतरिम ज़मानत दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पहले कभी किसी भी राजनेता को चुनाव में प्रचार के लिये ज़मानत नहीं दी गई थी।
यहां एक ख़ास बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि राजनेता यानी कि अरविंद केजरीवाल या उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मांगी ही नहीं थी। उनका मुकद्दमा तो इस मुद्दे पर था कि उनकी गिरफ़्तारी ग़लत ढंग से हुई है। कमाल तो यह है कि जिस देश की अदालतों में लाखों केस बरसों से लटके हुए हैं उस देश की सुप्रीम कोर्ट के पास इतना ख़ाली समय है कि वह एक राजनेता को चुनाव में प्रचार के लिये अंतरिम ज़मानत देने के लिये उतावली दिखाई दे रही थी।
एक और राजनेता बिहार के लालू प्रसाद प्रसाद यादव काफ़ी अरसे से पैरोल पर चल रहे हैं। वे तो ब़ाकयदा घोषित अपराधी हैं। मगर वे भी अपनी पैरोल की शर्तों को धता बता कर चुनाव में ऐसे प्रचार कर रहे हैं जैसे उन्होंने कभी चारा घोटाला किया ही ना हो। और भारत की अदालतों को इससे कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता। 
कानून और न्यायविदों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे तमाम नागरिकों को समान रूप से देखें और उनके पद या रुतबे से अपने आपको प्रभावित न होने दें। मगर बात जब राजनीति पर आती है तो एक सवाल उठना तो स्वाभाविक है। “क्या आम नागरिकों की तरह भारत के उच्च-न्यायालयों अथवा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश चुनाव में वोट डालते हैं?” यदि वोट डालते हैं तो वे भी किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रति सद्भावना रखते होंगे। तो क्या मुकद्दमें पर निर्णय सुनाते हुए वे अपनी विचारधारा से प्रभावित होते हैं या फिर ‘पंच परमेश्वर’ बन कर पूरी तरह से न्यायसंगत फ़ैसला सुनाते हैं। 
अधिकांश फ़ैसले या तो पूरी तरह से कानूनी धाराओं पर आधारित होते हैं या फिर परम्पराओं पर। अरविंद केजरीवाल से पहले कभी किसी भी अदालत ने किसी भी कैदी को चुनाव प्रचार के लिये पैरोल या अंतरिम ज़मानत दी हो, ऐसा याद नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलीसिटर जनरल से सवाल पूछा कि अरविंद केजरीवाल को चुनावों से ठीक पहले क्यों गिरफ्तार किया गया। मगर यह तर्क नहीं माना कि केजरीवाल ने नौ बार सम्मन मिलने के बावजूद ई.डी. के साथ पूछताछ में सहयोग नहीं किया। फिर भारत में तो हर साल कई चुनाव होते रहते हैं, किस-किस नेता को कब-कब गिरफ़्तार किया जा सकता है, इसके लिये कोई दिशानिर्देश मौजूद नहीं है। 
कहने को तो भारत के प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने ब्राज़ील में जी-20 सम्मेलन में कहा था, “जज कोई राजकुमार नहीं होता है, उसका काम सेवा देना होता है। जजों के फ़ैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिये।” मगर क्या अधिकांश मामलों में ऐसा होता है?
केजरीवाल के मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संजीव खन्ना एवं जस्टिस दीपंकर दत्ता का अरविंद केजरीवाल को अंतरिम ज़मानत देने के मामले में कहना है कि, “हमने केजरीवाल को कोई विशेष छूट नहीं दी है। हमें यह न्यायसंगत लगता था। इसलिये उन्हें बेल दी।” उन्होंने यहां तक कहा कि इस फैसले के आलोचनात्मक विश्लेषण का स्वागत है। 
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपंकर दत्ता की बात को शायद हम सच मान भी लेते यदि झारखण्ड के मुख्य मंत्री हेमन्त सोरेन का मामला सामने न होता। केजरीवाल को अंतरिम ज़मानत देकर जज साहेबान ने एक नई परंपरा की शुरूआत कर दी थी। अब उसी परंपरा में जब हेमन्त सोरेन ने ज़मानत के लिये अर्ज़ी दी, तो उन्हें सीधा मना कर दिया गया। 

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अरविंद केजरीवाल पिछले एक दशक का सबसे बड़ा राजनीतिक अजूबा है। भारतीय संसद में उनकी पार्टी के पंद्रह सदस्य भी नहीं हैं, और वो भी  केवल राज्य सभा में, मगर वे अपने आपको प्रधानमंत्री पद का दावेदार सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। केवल पंजाब राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली में उनकी सरकार है। मगर उन्हें उत्तर प्रदेश और अन्य बड़े राज्यों में चुनाव प्रचार के लिये बुलाया जा रहा है। उनके जेल जाने को भी बढ़ा-चढ़ा कर बेचा जा रहा है। 
अरविंद केजरीवाल ने अपनी अंतरिम ज़मानत का ग़लत फ़ायदा उठाते हुए मतदाताओं से सीधे अपील करनी शुरू कर दी। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा, अगर आप चाहते हैं कि मैं वापस जेल में न जाऊं तो लोकसभा चुनाव 2024 में इंडी गठबंधन के उम्‍मीदवारों को वोट दें। अगर आप मुझे प्‍यार करते हैं तो नरेंद्र मोदी सरकार को रिजेक्‍ट कर दें। अब यह आपके हाथ में है कि मैं जेल में जाऊं या नहीं। अगर आप 25 मई को कमल के फूल पर बटन दबाएंगे तो मुझे जेल जाना पड़ेगा।’
अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, “उन्‍होंने मुझे जेल में इसलिए रखा क्‍योंकि मैंने आपके बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा दी. अच्‍छे स्‍कूल बनाए। आप लोगों को निशुल्‍क बिजली दी, फ्री दवाएं दी. यहां तक कि जब मैं तिहाड़ जेल गया तो वहां मुझे 15 दिन तक डायबिटीज की दवाएं नहीं दी गईं। जबकि मैं पिछले 10 साल से इंसुलिन ले रहा हूं। इन लोगों ने मुझे जेल के अंदर तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन बजरंगबली की कृपा से केजरीवाल टूटा नहीं।” जहां तक हमारी जानकारी है तिहाड़ जेल दिल्ली सरकार के जेल मंत्री के तहत आती है जो कि केजरीवाल की पार्टी के ही हैं और स्वयं तिहाड़ में मसाज करवाते रहे हैं। 
ई.डी. की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चुनावी रैलियों में दिए गए केजरीवाल के इन भाषणों पर विरोध जताया कि “अगर जनता आम आदमी पार्टी को वोट देती है तो उन्हें दो जून को जेल वापस नहीं जाना पड़ेगा।” तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने अपने दावों से जमानत की शर्त का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा, ‘‘वह क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं? यह संस्था पर तमाचे की तरह है।’’
थोड़ी हैरान करने वाली बात यह भी रही कि पहले जर्मनी और फिर अमरीका ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर टिप्पणी की। ज़ाहिर है कि भारत सरकार ने इस पर तल्ख़ प्रतिक्रिया दिखाई और दोनों देशों के राजदूतों को तलब करके आपत्ति दर्ज कराई और केजरीवाल की गिरफ़्तारी को भारत का घरेलू मामला बताया। अमरीका ने तो अपने राजदूत को तलब करने पर भी प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर दी।

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अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा, “अमरीका निष्पक्ष, पारदर्शी और समय पर कानूनी प्रक्रियाओं को अंजाम तक पहुंचाने का समर्थन करता है और उन्हें नहीं लगता कि किसी को आपत्ति होनी चाहिये।”… हम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी सहित इन कार्रवाइयों पर बारीकी से नज़र रखेंगे।”
भारत के विदेशमंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बेबाक टिप्पणी करते हुए अमरीका को कसा और कहा, “जिन देशों को अपने चुनाव का परिणाम तय करने के लिए अदालत जाना पड़ता है, वे हमें इस बारे में व्याख्यान दे रहे हैं कि चुनाव कैसे आयोजित किया जाए।”
यह कैसे संभव है कि भारत में एक संस्था ऐसी हो जिसमें काम करने वाले अधिकारियों पर कोई टिप्पणी न की जा सके। हम आई.ए.एस. अधिकारियों पर टिप्पणी कर सकते हैं; मुख्यमंत्री, सांसदों, केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री पर टिप्पणी कर सकते हैं; तो फिर यदि हमें महसूस होने लगे कि अदालत का फ़ैसला कानून और संविधान के तहत न होकर किन्हीं अन्य कारणों से प्रभावित हो रहा है तो हम क्यों न्यायमूर्तियों से सवाल नहीं कर सकते। अब जबकि पंच परमेश्वरों ने निर्णय के आलोचनात्मक विश्लेषण की इजाज़त दे दी है, तो अपनी हदों में रहते हुए हम ऐसे सवाल खड़े कर सकते हैं। 
फ़ोटो साभार : Law Trend

तेजेन्द्र शर्मा 

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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