यूक्रेनी-हिन्दी लेखक तथा कवि यूरी बोत्वींकिन के साथ मनीषा खटाटे का साक्षात्कार
यूक्रेनी-हिन्दी लेखक तथा कवि यूरी बोत्वींकिन के साथ मनीषा खटाटे का साक्षात्कार
(यूरी बोत्वींकिन अध्यक्ष-हिंदी और भारतीय भाषा, शेव्वेंको कीव राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (यूक्रेन, कीव क्षेत्र) से है और मनीषा खटाटे हिन्दी साहित्यकार है।)
युरी बोत्वींकिन – मनीषा जी आप अपना परिचय दिजिएगा
मनीषा खटाटे – सबसे पहले मैं जनसरोकार मंच और आपका हृदय से धन्यवाद देती हूँ कि आपने मुझे यह वार्तालाप करने का अवसर दिया है।आपका विशेष रूप से आभार व्यक्त करती हूँ कि युक्रेन में रहकर आप हिंदी भाषा की सेवा कर रहें है,और यह हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है।और यह सुसंवाद आप जैसे कवि,लेखक तथा समीक्षक के साथ हो रहा है यह और भी रोचक बना देता है।
मैं मेरा व्यक्तिगत परिचय क्या दूँ ? किसी लेखक या सृजेता के लिए उसका सृजन ही उसका असली परिचय होता है।उसका सृजन ही उसे अमर बना देता हे।उसकी किताबें ही किसी लेखक के जीवन का परिचय बन जाती है बाकि उसके जीवन की यथार्थ यात्रा तो सिर्फ उसके सृजन के संदर्भ बनकर रह जाते है।लेखक का अपना आत्म बोध,उसकी आत्म जागृती,उसकी किताबोंद्वारा पाठकों का या समाज का कितना पुनरूत्थान करता है या जीवन को ऊँचा उठाने के लिए प्रेरीत करता है इसपर निर्भर करती है लेखक की सार्थकता।लेखक की आत्म दृष्टि,आत्मबोध या दर्शन के लिए किसी लेखक,कवि को पढ़ना चाहिए।
फिर भी मैं मनीषा खटाटे हूँ,नासिक,महाराष्ट्र,भारत में मेरा जन्म हुआ है,मेरी माँ कमल और पिताजी अविनाश जी की बेटी हूँ और मेरी सांस सुमन खटाटे और ससुर भिमाजी खटाटे जी की बहू हूँ।मेरा परिवार और मेरे अपने आशीर्वाद बनकर मेरे पिछे खड़े है।यह तो यर्थार्थ परिचय हुआ परंतु मैं ऐसी श्रद्धा रखती हूँ कि चेतना का विकसित स्वरूप ही मनुष्य का असली परिचय होता है।
जब मुझे मेरे जन्म होने का कारण पता चला तबसे मैं मेरे जीवन के हर एक पल को शब्दों से अभिव्यक्त कर रहीं हूँ क्योंकि मैं लिखने के लिए ही इस धरती पर आयी हूँ और लेखन ही मेरे जीवन अर्थ दे सकता है तो मैं जान गयी कि
स्वयं की आत्मा पर लगी गहरी चोटों को समझो तुम,
जो कहना चाहती है उसे जानो तुम,
जान लो उसकी वेदना और दुःखो को,
वहीं खोलेंगे एक दिन आत्म-प्रकाश के द्वार…..
मरीचिका से जल बहता नहीं कभी,
निराशा से स्त्री मरती नहीं कभी,
ना समझो तुम मुझे नकारा,
मैं एक स्त्री हूँ,
मैं एक प्रकृति हूँ,
मैं एक अस्तिस्त हूँ,
मैं एक सृजन शक्ति हूँ,
और मैं एक मूल्य हूँ ।
मरूस्थल प्रकाशित होने तक परमात्मा या सृष्टि मेरे लेखक होने तक मेरी तैयारी कर रहें थे और प्रतीक्षा भी।तब तक प्रकृति ने मेरी साहित्यिक चेतना को इस तरह तराशा कि मेरी करकमलों से “मरूस्थल” जैसा दार्शनिक शैली में किसी स्त्री द्वारा पहली बार ऐतिहासिक कार्य करवाया।मेरी साहित्यिक चेतना के विकासक्रम में “मरूस्थल” ही मेरा प्रथम परिचय है।
उत्तुंग हिमालय को छुने की अभिलाषा,
मेरे मन में अवतरित हुई,
हाथ फैलाकर,आँखें मुँदकर देखा,
तो ईश्वर की छविं अवतरित हुई,
चाँद,सुरज और हिमालय,
मेरे हर प्रयाय में पिछे खड़े थे मेरे,
या उन्ही की हाथों ने मुझे ऊँचा उठाया था,
पता नहीं एक पल में यह हुआ था,
या सदियाँ लगी थी इस एक पल के लिए।
यूरी बोत्वींकिन – आपकी हिंदी (और मराठी?) लेखन यात्रा।
मनीषा खटाटे – कई बार मेरे बारें सोचा जाता है कि अरे ! यह कबसे लिखने लगी क्योंकि परिवार में मैं कभी अपने लेखन को व्यक्त नहीं करती थी।परंतु प्रकृति हर एक व्यक्ति अवसर देती है कि वह खुलकर एक स्वतंत्र फुल बन जाए क्योंकि हरएक व्यक्ति के अवचेतन में सृजन के बीज पड़े रहते है उसको अपने अस्तित्व से खिलने का मौका देना चाहिए।आपकी उम्र महज एक संख्या हो सकती है।किसी भी उम्र में आप सृजन की यात्रा का आरंभ कर सकते है।
मैं सोचती हूँ कि मेरी लेखन यात्रा बचपन से ही शनैः,शनैः शुरु हुई थी।तब मैं “अबोली” नाम से मराठी में लिखती थी और मेरी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थी।लेकिन जब मैंने पद्मश्री विष्णु पण्ड्याजी के “क्षण,काल और…” इस हिन्दी काव्य संग्रह का अनुवाद मराठी में “क्षण,काळ आणि…” किया तो मराठी लेखक की शुरूवात सहीं मायनो में हुई।पद्मश्री विष्णु पण्ड्याजी
भारतीय साहित्य में एक मुख्य नाम है।वे गुजरात से आते है।वे गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे और वे अद्वितिय प्रतिभा के धनी है।इसके साथ मैंने और कई हिन्दी किताबों का अनुवाद किया है वे जल्द ही प्रकाशित होंगे।
हिन्दी भाषा में लेखन की यात्रा सहीं अर्थों में परमपुज्य गगनगिरी महाराज की मैंने “गुरू सप्तशति” का अनुवाद मराठी से हिन्दी में किया तो उनके आशीर्वाद से मेरे लेखन की शुरूवात हो गयी।वह अनुवाद मेरे यु ट्यूब चैनल पर उपलब्ध है,गगनगिरी महाराज महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध संत है।
तो ऐसा मैं कह सकती हूँ कि मराठी और हिन्दी लेखन यात्रा की शुरूवात तपस्वी महात्माओं के आशीर्वाद से हुई है।
यूरी बोत्वींकिन – हिंदी और मराठी साहित्य की आपसी पहचान।
मनीषा खटाटे – मराठी भाषा को अभी अभिजात भाषा का दर्जा मिला हुआ है।मराठी भाषा या साहित्य को भी अपना इतिहास है।मराठी संत नामदेव ने भी हिंदी में रचना की है तथा ग्रथसाहिब में वे सम्मिलित है।
हिंदी और मराठी साहित्य दोनों भारतीय संस्कृति के दो प्रमुख स्तंभ हैं। इन दोनों भाषाओं की जड़ें भारतीय परंपरा, लोकजीवन और भावसंवेदना में गहराई से जुड़ी हुई हैं। मराठी साहित्य में संत परंपरा का प्रभाव जैसे संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव आदि में दिखाई देता है, तो हिंदी में भी तुलसीदास, कबीर, सूरदास जैसे संत कवियों ने भक्ति आंदोलन को सशक्त किया।
दोनों भाषाओं में समान विषय मिलते हैं — भक्ति, मानवता, समाज सुधार, और राष्ट्रप्रेम। हिंदी के प्रेमचंद और मराठी के कवि जो नासिक से है कुसुमाग्रज,वसंत कानिटकर जैसे लेखकों ने सामान्य जनजीवन को अपनी रचनाओं में जीवंत किया है।
भाषाई दृष्टि से भी हिंदी और मराठी में कई शब्द संस्कृत से आए हैं, जिससे एक आत्मीय निकटता बनती है। दोनों साहित्य एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं — अनुवाद, अध्ययन और सांस्कृतिक आदान–प्रदान से इनके बीच निरंतर संवाद चलता रहा है।
इस प्रकार, हिंदी और मराठी साहित्य एक ही भारतीय आत्मा की दो अभिव्यक्तियाँ हैं — जो विविधता में एकता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
आज मराठी भाषा के प्रतिभाशाली उपन्यासकार श्री.विश्वास पाटील जी का काफि साहित्य हिन्दी में अनुवादीत हुआ है और उनको इस बात पर बधाई देना चाहती हूँ कि वे अभी ९९ वे अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन के अध्यक्ष के रूप में चूने गए है।इतने बड़े पैमाने पर साहित्य संमेलनों का आयोजन सिर्फ मराठी साहित्य में होता है।यह बड़े गौरव की बात है।
यूरी बोत्वींकिन – मरुस्थल से पहले का आपका लेखन।
मनीषा खटाटे – मरूस्थल लिखने से पहले मैं कहानियां,कवितायें लिखती थी।इसकी भी अपनी एक कहानी है।मेरा “मनीषा खटाटे – साहित्य जगत” नाम से एक युट्युब चैनल है।उस पर मैं अपनी लिखी कहानियां और कविता प्रस्तुत करती थी।किसी एक छोटी लडकी ने युट्युब से मेरी कहानी सुनकर एक समारोह में प्रस्तुत की तो उस कहानी बड़ी सराहना हुई।उस लडकी ने यह भी कहा कि यह कहानी मनीषा खटाटे की है तो मुझे मेरी सामाजिक पहचान एक लडकी ने करा दी तो मैं उसका भी आभार मानती हूँ।मैं कहानी पढ़कर सुनाया करती थी तब किसी ने मुझसे कहा कि पढ़कर सुनाना है तो मत सुनाओ।यह काम ही मत करो,इससे ज्यादा दुसरा कुछ करो तो मैंने उसकी बात मानी तो मैंने लेखन प्रकाशित करना शुरू किया।ऐसे ही मैं आगे बढ़ती गयी।मुझे दर्शकों और पाठकों का काफि अच्छा प्रतिसाद भी मिलता था।मेरा आत्म विश्वास बढ़ रहा था।
परंतु मुझे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली जब मेरी “अनसुलझी पहेली” यह कहानी नेपाल की पत्रिका “द पब्लिक” में प्रसिद्ध हो गयी।मैंने करीब ५१ कहानियां लिखी है उनका “मेरे आयाम की कहानियां” नाम से जल्द ही प्रकाशित होंगी।मेरे कहानियों की धारणा यह है कि मनुष्य की चेतना जिस आयाम में विकसित होती है उस आयाम में ही उसको जगत,जीव,आत्मा,समाज दृष्टिगत होते है और लेखक के तौर पर वही लिखता रहता है जैसे यथार्थवादी तथ्यों के आधार पर ही अपनी कहानी को गतिशील रखता है।इसका अर्थ यह हुआ कि चेतना आयाम ही आपकी सृजनशीलता निर्धारीत करते हे।अर्थात सृजनशील चेतना को विकसित करने के लिए आपको अनेक तरह की साधनाएं करनी होती है जिसके द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति संभव हो सके।
कहानियों के साथ,साथ “मरूस्थल” खण्डकाव्य का लेखन भी चल रहा था।मरूस्थल के लेखन के लिए हमारे पारिवारिक मित्र परम आदरणीय अजय शुक्लाजी का अमूल्य योगदान रहा है।मरूस्थल रचने और बनने तक की सारी प्रक्रिया में अजय शुक्ल भाई जी नींव के पत्थर जैसे है जिनकी शुभकामनाओं की बदौलत “मरूस्थल” की रचना हुई।और आज “मरूस्थल” ने मुझे कवि या सृजेता के रूप में स्थापित कर दिया।
यूरी बोत्वींकिन – मरुस्थल में प्रकट हुए आपके आध्यात्मिक चिंतन का इतिहास, प्रेरक और कारक।
मनीषा खटाटे – मरूस्थल धरती एक ऐसा अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग है जो पृथ्वी को प्राकृतिक समन्वय से बाँधता है।मरूस्थल है इसलिए हरियाली है।मरूस्थल है इसिलिए हम भी जिवित है।मरूस्थल स्वयं तपकर किसी दुसरे के लिए अपने आशीष छोड़ता हुआ दिखाई देता है।एसे ही हर एक मनुष्य के जीवन में अपना,अपना मरूस्थल उसके अवचेतन में रहता है दुःख,दर्द और वेदना के रूप में।यही दुःख,दर्द और वेदना मनुष्य को आत्मचिंतन करने के लिए बाध्य करते है।यही चेतना का मरूस्थल होता है।यही चेतना का नकारात्मक हिस्सा है,यही चेतना की शून्यता होती जो स्वयं की खोज करने के लिए मनुष्य को मजबूर करती है।और मनुष्य की अंतर्यात्रा शुरू हो जाती है।इसी दुःख,दर्द और वेदना से मनुष्य की मनुष्य की बुद्ध बनने की यात्रा आरंभ हो जाती हे।अपने दुःख,दर्द और वेदना को पहचानकर उसे सृजनात्मक मानवता के मूल्यों रूपांतरित करने के कला को ही अध्यात्म कहते है।
अनंत ब्रह्मांड में ‘स्व’ की खोज करना और उस ‘स्व’ को जीवन के उद्देश्य पूर्ति तक की अंतर्यात्रा कराना यह सारा संभव होता है जब परमात्म कृपा दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के लिये मनुष्य के आत्म द्वार पर दस्तक देती है तब मरुस्थल की साधना के द्वारा परमात्म अपेक्षा यह रहती है कि तुम आत्म उपलब्धि की उच्चता प्राप्त करो जो चेतना की परम मुक्त अवस्था है जिसमें जीवन का रहस्य छुपा है, मरुस्थल आमंत्रण है ऐसे पराक्रम की पराकाष्ठा तक स्वयं को स्थापित करते हुए गतिशील रहकर साधना के पथ पर अथक साधक की भांति निरंतर तुफानों से लड़ने के लिए अग्रसर होते हैं.
बादलों को चीरकर सूरज,
तुम निकलोगे ही एक दिन.
पर्वतों से निकली हुई पानी की धारा,
नदी बनकर बहेगी एक दिन.
सपने भी मेरे इतिहास रचेंगे,
जब – जब दिया जायेगा हिंदी का नारा,
अभिमान से लिखा जायेगा नाम मेरा,
मराठी से बह रही है हिंदी में पहली बार मेरे खंड-काव्य की धारा………..
मरुस्थल साधना है,
मरुस्थल प्रार्थना है,
मरुस्थल आत्मज्ञान है,
मरुस्थल आत्म- सृजन है सबसे ज्यादा.
आँखों में इतने समुंदर. मैंने समाएं कि.
शब्द बनकर मरूस्थल से भी प्रकट हो गये.
अपने अपने मरुस्थल जानकर पहचानकर,
करलो यात्रा एक बार,
मुक्ति को पाना चाहते हो – तो,
तोड़ दो मरीचिका अपनी एक बार
फिर नृत्य होगा, फिर संगीत होगा,
फिर रस होगा,
फिर हर स्वतंत्रता की अनुभूति आनंद में ही व्यक्त होगी.
यूरी बोत्वींकिन – मरुस्थल खंड-काव्य। शैली, कथा वस्तु, विचार, मूल बिंदुएं, सीख, संदेश।
मनीषा खटाटे – मरूस्थल यह खण्डकाव्य संरचना,कथावस्तु,शैली तथा विचार की दृष्टि से अनोखा और अनूठा है।संरचना की दृष्टि से क्रांतिकारी भी है।संभवतः हिन्दी साहित्य अपना विशेष महत्व रखता है।यह एक तो पद्य रचना नहीं है यह गद्यात्मक आकृतीबंध में लिखा हुआ है।दुसरी बात यह किसी की कहानी नहीं है जो खण्डकाव्य और महाकाव्य का विषय होती है।तिसरी और मुख्य बात यह दार्शनिक शैली में लिखा गया है।चौथा महत्वपूर्ण बिंदू यह है कि मरूस्थल स्त्री विमर्श का दार्शनिक दस्तावेज भी है जो अंत में स्त्री चेतना के मुक्ति की आवाज उठाता है।
मरूस्थल प्ररोचना पद्मश्री विष्णु पण्ड्याजी ने लिखी है जो एक मशहूर साहित्यकार है।भूमिका आचार्य देवेंद्र देव जी ने लिखी है जिन्होंने हिंदी साहित्य में करीब २१ महाकाव्य लिखे है तो अनुशस्ति डाॅ.अजय शुक्ला जी ने लिखी है जो एक व्यवहार मनोवैज्ञानिक है।
मरूस्थल का मुखपृष्ठ का विमोचन नेपाल में हुआ था।नेपाल के सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री.सनत रेग्मी,भाषाविद श्री.अमर गीरी,कवि गोपाल अश्क और समीक्षक हरि तिमिल्सिना जी के हाथों से हुआ था।और इसकी वर्षगाँठ कार्यक्रम युक्रेन से हो रहा है।यह भ मेरे लिए गौरव की बात है।
> मरूस्थल की ऐतिहासिकता यह है कि रांगूय राघव के “मेधावी” नामक दार्शनिक शैली में १०० साल बाद लिखा गया खण्डकाव्य है।
> इस खण्डकाव्य की शुरूवात “सर्ग शून्य” से हो जाती हे।शून्य हमारे समस्त अस्तित्व का आरंभ बिंदू होता है।शून्यता और पूर्णता की अवधारणा हमारे अस्तित्व की अभिव्यक्ति होती है।
> इस खण्डकाव्य में …… डाॅट,डाॅट जो है या बिंदू जो है वे अनंत की अवधारणा की उपस्थिति शून्यता के साथ करते है जो अभिव्यक्ति और अर्थ की अनंत संभावनाओं की संभावनाओं को दर्शाता है।
इस अर्थ में मैंने कहा है कि मरूस्थल अपने पाठक खुद चूनता है या ऐसा भी कहना संभव है कि जिसको कान है वे ही सुन पाएंगे,जिसको आँख है वेही देख पाएंगे।
दार्शनिक शैली का आधार तत्त्व दार्शनिक यथार्थवाद की अनुभूति है जैसे मनुष्य समाज,मन,भावना,संवेदनाओं का एक अहम हिस्सा है उसी तरह दार्शनिक अवधारणाएं भी मनुष्य को बनाती है,प्रतिक्रिया कैसे देनी है,समन्वय का उपयोग कहां पर करना है,सत्य,अस्तित्व,जीव,जगत,आत्मा,चेतना,प्रज्ञा,नीति या प्रज्ञान के संदर्भ में कैसे विमर्श करना है,यह सारी गतिविधियां दार्शनिक यथार्थवाद में आती है।
यथार्थवाद में जादूई यथार्थवाद,सामाजिक यथार्थवाद,ऐतिहासिक यथार्थवाद,संवेदनशील यथार्थवाद,मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद साहित्यिक विधा और संरचना में विकसित हुआ।
साहित्य में सबसे पहले दार्शनिक यथार्थवाद ,मनुष्य जीवन का सत्य और अर्थ टपनी अवधारणाओं में खोजता है।उसी तरह से श्रद्धा,विश्वास और धारणा बनाता है तथा उसी धारणाओं में उसे सत्य का भी दर्शन होता है।
इस धरा पर लिया है जनम,
तो क्या है जो वो करे ?
दुःख को जाने,
सुख को माने,
जानना ही है तो सत्य को जाने,
सुंदरता को देखें,
अनुभव करें,
प्रेम करे स्वयं से,
प्रकृति से,सृष्टि से,
और समस्त आकाश से,
अँधेरे में चाँदणी खोजो,
पेड़-पौधों से उनका हाल पुछो,
कली से फुल बनने तक की यात्रा देखों,
अरे!तुम क्या करते हो ?
युद्ध,क्या वह समाधान है ?
द्वेष,क्या वह मन की असली गति है?
जीवन है तो उसे खोज में लगाओ,
जो है उसे दांव पर लगाओ,
जल की धारा बनकर,
प्रपात बन जाओ,
पहाड़ो से गिरने का मजा तो देखो,
नदी बनकर पत्थरों को चिरकर,
जंगलों से गुजरकर,
सागर में मिटकर महासागर बनने का मजा तो उठाओ,
तूफ़ान देखों,
सागर को भी जगाकर किनारों पर लाते है,
वह तूफ़ान बन जाओ,
इस धरा पर लिया जनम तो
अंत में मिट्टी बन जाओ ताकि उससे अच्छी जमीन बन सकें।
सृष्टि, मनुष्य और स्त्री के अलावा साहित्य अपूर्ण है. जैसे प्रकृति के बिना पुरुष,शक्ति के बिना शिव और स्त्री के बिना मनुष्यः स्त्री विमर्श के बिना साहित्य अधूरा है।
स्त्री सृष्टि के बाद सृजनशील शक्ति है। स्त्री सुद अपनी चेतना को दिव्यत्व और दिव्य कथाओंसे अपने आप को मुक्त करना चाहती है। वो ज्यादा से ज्यादा मानवीय आयाम में जीना चाहती है।
स्त्री होना एक साधना है,
स्त्री चेतना एक प्रार्थना है,
स्त्री तत्त्व एक आत्मज्ञान है,
स्त्री अस्तित्व आत्म सृजन है सबसे ज्यादा..
आँखों में इतने समुंदर,मैंने समाएं कि शब्द बनकर नारी की निर्भिक आवाज़ बनकर प्रकट हो गये.
यूरी बोत्वींकिन – कुछ पद्यंश पढ़कर सुनाइए।
0) आरंभ – विश्व चेतना के रुप में करता है अनंत वापसी..
अनंत वापसी – प्रलय में होती है विलय.
अंत फिर जन्म लेता है विश्व चेतना में…..
अनादि – अनंत और निरंतर है नृत्य वापसी का सृजन के नाद ब्रह्म में…
ब्रह्मांड – संपूर्णता और चेतना की सृजनात्मक
अभिव्यक्ति आत्म ऋचाओं की संरचना में.
और एक विराट नाट्य विश्व चेतना का ब्रह्मांड में.
विश्व चेतना को भी नहीं छूटता मोह माया से दूर होने का…
क्योंकि – माया का महानतम नाट्य है इस धरती पर….
क्योंकि – माया का महानतम नाट्य है यह संसार…
क्योंकि – माया का महानतम नाट्य है मनुष्य का अस्तित्व.
क्योंकि – माया नहीं उपलब्ध स्वर्ग में.
क्योंकि – स्वतंत्रता नहीं उपलब्ध स्वर्ग में..
क्योंकि – मनुष्य आत्मा की छटपटाहट –
मुक्ति के लिए नहीं उपलब्ध स्वर्ग में.
यह तो सारा खेल और प्रयोजन है माया का मनुष्य के लिए……….
नियमों के तहत और नियमों के पार खेलना है
यह खेल इस धरती पर….. इस संपूर्ण प्रयोजन में प्रेम ही वह आत्म भाव है जो बन सकता है स्वतंत्रता और मुक्ति का पथ… प्रेम की शक्ति से मनुष्य दूर कर सकता है सारे पर्दे संसार के……. प्रेम की धारा विश्च चेतना की तरफ बहती है ……….. जान लेना कि वह है एकमात्र मुक्ति का पथ……… प्रेम की ऋचाएं बन जायेगी आत्म ऋचाएं तब…… जब दिव्य ज्ञान – अंतर्ज्ञान में संतुलन लाता है प्रेम के द्वारा……
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