विधि के शासन की ओर नेपाल—राजनीतिक भावुकता नहीं, संस्थागत न्याय की आवश्यकता: अजयकुमार झा
अजयकुमार झा, जलेश्वर, 29 मार्च 026 । नेपाल की समकालीन राजनीति एक महत्वपूर्ण संक्रमण के दौर से गुजर रही है, जहाँ कानून के शासन (Rule of Law) को स्थापित करने की दिशा में कुछ ठोस और साहसिक कदम दिखाई दे रहे हैं। हाल के घटनाक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली तथा अन्य प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया प्रारम्भ होना इसी परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति की हैसियत संविधान और न्यायपालिका से ऊपर नहीं हो सकती। अतः यदि किसी भी व्यक्ति पर आरोप हैं, तो उनका परीक्षण न्यायालय के माध्यम से होना ही विधिसम्मत और न्यायोचित मार्ग है।
इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो नेपाल में कई ऐसी घटनाएँ रही हैं जिनकी निष्पक्ष जाँच न होने के कारण राजनीतिक अविश्वास और दण्डहीनता की संस्कृति को बल मिला। 1993 में रहस्यमय सड़क दुर्घटना में मदन भण्डारी और जीवराज आश्रित की मृत्यु आज भी एक ज्वलंत उदाहरण है। उस समय यह घटना दासढुंगा (चितवन) में हुई थी, जिसे आधिकारिक रूप से दुर्घटना कहा गया, परंतु अनेक राजनीतिक विश्लेषकों और आयोगों ने इसे संदेहास्पद माना। उस समय गृहमंत्री के रूप में के पी शर्मा ओली की भूमिका पर भी प्रश्न उठे कि क्या जाँच निष्पक्ष और गहराई से कराई गई थी। यदि उस समय पारदर्शी और निष्पक्ष जाँच होती, तो सम्भवतः नेपाल की राजनीति आज अधिक विश्वसनीय और उत्तरदायी रूप में विकसित होती।
यही नहीं, नेपाल में भ्रष्टाचार, सत्ता दुरुपयोग, और विभिन्न घोटालों के अनेक मामले वर्षों से लंबित रहे हैं। चाहे वह नीतिगत भ्रष्टाचार हो या सत्ता के दुरुपयोग के आरोप—अनेक मामलों में जाँच की प्रक्रिया या तो अधूरी रही या राजनीतिक दबाव में कमजोर पड़ गई। यही कारण है कि दण्डहीनता (Impunity) नेपाल की राजनीति का एक स्थायी संकट बन गया है। वर्तमान में यदि सरकार इन मामलों को पुनः खोलने या निष्पक्ष जाँच कराने का संकेत दे रही है, तो इसे लोकतांत्रिक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में।
जनता की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में जनभावना महत्वपूर्ण अवश्य है, परंतु न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए भावनात्मक भीड़ का सड़क पर उतरना संस्थागत व्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है। के पी शर्मा ओली के समर्थन में सड़कों पर उतरने वाले कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा कि उनका अधिकार शांतिपूर्ण विरोध तक सीमित है, न कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप तक। विधि का शासन तभी मजबूत होगा जब सभी पक्ष न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करने की परिपक्वता दिखाएँ।
राजनीतिक दलों के भीतर भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। महेश बस्नेत, शंकर पोख्रेल, और पृथ्वी सुब्बा गुरुङ जैसे नेताओं की भूमिका और उनके राजनीतिक निर्णयों का भी वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन होना चाहिए। किसी भी पार्टी की दीर्घकालिक सफलता केवल नेतृत्व के करिश्मे पर नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता और नैतिकता पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में मनमोहन अधिकारी और मदन भण्डारी द्वारा स्थापित आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं, जिन्होंने राजनीति को जनसेवा और सादगी से जोड़ा।
वर्तमान सरकार, जिसे नई पीढ़ी का प्रतिनिधि माना जा रहा है, यदि वास्तव में पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय को प्राथमिकता देती है, तो उसे बिना किसी भेदभाव के सभी मामलों की जाँच करानी होगी। केवल विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और अपने पक्ष के लोगों को संरक्षण देने से यह प्रक्रिया अविश्वसनीय हो जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि जाँच एजेंसियाँ स्वतंत्र रूप से कार्य करें और न्यायालय निष्पक्ष निर्णय दे।
अंततः, नेपाल के लिए यह समय भावनात्मक उबाल का नहीं, बल्कि संस्थागत परिपक्वता का है। यदि देश को एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में स्थापित करना है, तो दण्डहीनता की संस्कृति का अंत और विधि के शासन की स्थापना अनिवार्य है। के पी शर्मा ओली के समर्थकों सहित सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा कि न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
नेपाल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वह या तो अतीत की गलतियों को दोहराएगा, या फिर एक नए, पारदर्शी और उत्तरदायी राजनीतिक भविष्य की ओर बढ़ेगा। निर्णय जनता, राजनीतिक दलों और संस्थाओं—तीनों को मिलकर लेना होगा।


