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देखो मुझे खुशियाँ ढूढने लगी हैं, शायद थोडी बडी हो गयी हूँ मैं,

 

सुरभि मिश्रा

सुरभि मिश्रा

अरे सुनो, जरा सी खो गयी हूँ मैं,
चुप रहना जरा कहीं सपनो में सो गयी हूँ मैं,
और देखो मुझे खुशियाँ ढूढने लगी हैं शायद,
शायद थोडी बडी हो गयी हूँ मैं,
शायद थोडी बडी हो गयी हूँ मैं,
अब चुप रहना सीख गयी हूँ तकलीफों में,
मुस्कुराना बेगानी महफिलों में,
अब बात भी लग जाये कहीं मुझे,
तो अब सिसकियों का गला घोट देती हूँ,
रो रो कर गला भारी हो गर तो,
पापा को जुकाम का हवाला देती हूँ,
सुनो, 
हाँ मैं शायद सचमुच बडी हो गयी हूँ।
सुनो,
अरे सुनो,
जरा सी खो गयी हूँ मैं।

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कभी चंचल चपला सी कभी शांत झील सी,
कभी घिरी व्योम सी तो कभी शीत रजत सी हो जाती हूँ,
मायने समझ रही अब मैं भी औरों की,
तो कभी रवि के तेज सी हो जाती हूँ,
सुनो, 
हाँ मैं शायद सचमुच बडी हो गयी हूँ।
सुनो,
अरे सुनो,
जरा सी खो गयी हूँ मैं।

यार की यारी खोने से डरती हूँ,
अपनो के वफादारी को खोने से डरती हूँ,
डरती हूँ मै अपने जिम्मेदारी से डरती हूँ,
समाज के लगे पहरेदारी से डरती हूँ,
हाँ खुद को खोने से डरती हूँ,
सुनो,
मैं शायद मैं सचमुच बडी हो गयी हूँ, 
अपनो को गैरो सा होने पर डरती हूँ,
हाँ मैं शायद सचमुच बडी हो गयी हूँ।
सुनो,
अरे सुनो,
जरा सी खो गयी हूँ मैं।

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Surabhi mishra

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