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पर्यटन वर्ष २०२० : प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

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हिमालिनी, अंक- दिसंबर 2019 ।सन् २०१९ का पटाक्षेप होकर विश्व जहां सन् २०२० के सूर्य की लालिमा से आलोकित होने जा रहा है, वही नेपाल सूर्य की ऊर्जा को ग्रहण करते हुए ‘नेपाल भ्रमण वर्ष’ की अपनी योजना को साकार रूप देने के लिए अग्रसर हो रहा है ।

भिन्न–भिन्न लोगों की अलग–अलग चाहत होती है । अतः विभिन्न देशों से आनेवाले पर्यटकों की चाह भी अलग होना निश्चित है । किसी धर्मावलंबी की चाह नेपाल के धर्मस्थलों की यात्रा प्राथमिकता की सूची में होगी तो किसी प्रकृतिविद् या प्रकृतिप्रेमी की चाह हिमाच्छादि पर्वतों को निकट से निहारने, दिन के विभिन्न प्रहर में उसकी बदलती छवि और प्रकट होती अलौकिक सुंदरता को अपने कैमरे में कैद कर ले जाने की होती है । कोई इन पर्वतीय क्षेत्रों के निकट के वन्यजन्तु आरक्षण स्थल और आसपास के जंगलों की हरियाली को देखने, उनमें चहचहाते, कलरव करते और क्रीड़ा करते हुए विभिन्न आकार, प्रकार और रंगों के पक्षियों को देखने और उन्हें अपने कैमरे में कैद करने की चाह रखता है । कहने का तात्पर्य यह है कि सभी पर्यटक अपनी चाह के अनुसार के जिलों की यात्रा को प्राथमिकता देते हैं और इस अवधि में देश के ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटकीय महत्व के स्थलों को देखते और राजप्रसादों और महलों के वास्तुशिल्प को सुंदरता को निहारते हुए उनके संबंध में जानकारियां प्राप्त करने की भी होती है ।

अतः पर्यटन वर्ष २०२० से संबद्ध सभी विषयों और योजनाकारों को इन क्षेत्रों की यात्रा करने वाले पर्यटकों को वे सभी सुविधाएं सुलभ कराने में ध्यान देने की आवश्यकता होगी, जो उनकी नेपाल यात्रा को अविस्मरणीय बनाये ।

पर्यटक के रूप में मुझे देश के विभिन्न भागों में आने–जाने का अवसर मिला । भारत और अमेरिका जैसे विकसित देशों के ऐतिहासिक, दर्शनीय और पर्यटकीय महत्व के स्थलों को देखने का अवसर मिला । एक नियात्री के रूप में जब मैं अपने देश में घूमने लगा, तब मुझे कई संरचनाओं का अवलोकन करते हुए कई सुधारों की आवश्यकता का अनुभव हुआ । राजधानी काठमांडू की बात की जाय तो स्थिति में और कई सुधारों का अनुभव होता रहा । उदाहरणार्थ, काठमांडू एक ऐतिहासिक नगरी है । यह कई राजनैतिक घटनाओं और ऐतिहासिक उथल–पुथल से प्रभावित होता रहा है । यह देश शहीदों की भूमि रही है, जिन्होंने देश को क्रुर शासकों के पंजों से निकालने के लिए अपने जीवन को बलि वेदी में चढ़ाने में भी हर्ष का अनुभव किया ।

उन शहीदों के शहीद स्थलों से पर्यटकों को अवगत कराने का जो काम होना चाहिए था, उसे प्रदर्शित करने में उदारता का अभाव पाया गया । उदाहरण के लिए दशरथ रंगशाला का नाम ही पर्याप्त होगा । यह अयोध्या के राजा के नाम पर नामकरण किया गया है या नेपाल के अग्रणी शहीदों में एक रहे दशरथ चन्द के नाम पर, विदेशी पर्यटक तो दूर नेपाल के सुदूर पश्चिम या पूर्वी क्षेत्रों से आनेवाले देशवासी भी समझ नहीं पाते होंगे । समान रूप से, काठमांडू के मध्य में नामांकित धर्मपथ और शुक्रपथ के और अर्थ महत्व को शायद ही कोई विदेशी पर्यटक समझ पाता होगा । सात समुद्र पार के देश के पर्यटक तो क्या निकटवर्ती पड़ोसी देशों को भी इन्हें देखकर यह समझ पाना कठिन होता होगा कि ये पथ देश के उन अग्रणी शहीदों के नाम पर रखे गए हैं, जिन्हें नेपाल के क्रुर राणा शासकों के हाथों फांसी पर लटकाना पड़ा था । नेपाल इतना गरीब देश भी नहीं है कि वह इन पट्टियों की लंबाई बढ़ाने और उन वीर शहीदों के नामों को पूर्ण रूप से दिखाने में लगने वाले खर्च का भार उठा नहीं सके । और वर्तमान गणतान्त्रिक व्यवस्था में यदि संबंधित निकाय के संविधान में संशोधन की आवश्यकता भी हो तो उसमें आवश्यक संशोधन कर इस त्रुटि को मिटाने में वह निश्चय ही अक्षम न होगा । इस कार्य में कोताही नहीं बरतनी चाहिए ।

इसके अतिरिक्त विभिन्न स्थलों और देश के पर्यटकीय महत्व के स्थलों की यात्रा करते हुए इस लेखक को यह भी आभास होता रहा कि इन स्थलों की समुचित प्रचार की आवश्यकता है । बसंतपुर दरबार के निकट ही एक स्थल है, जहां नेपाल के इतिहास ने करवट बदली थी और देश में राणा शासन की स्थापना की नींव पड़ी थी । वह घटना कोत पर्व के नाम से इतिहास के पन्नों में अंकित है और इस कथित ‘पर्व’ का नायक था, जंगबहादुर राणा ।

इसी स्थल के बगल में एक घर बसा है, जहां वीर शहीद गंगालाल का जन्म हुआ था । जिन शहीदों की वजह से देश में प्रजातान्त्रिक आन्दोलन की हवा बही, क्रूर शासकों से देश को मुक्ति मिली और देश में प्राजातन्त्र के उद्भव के साथ आज देश गणतन्त्रमय हो सका, आज उन शहीदों को अमरत्व प्रदान करने के मामले में सरकारी निकायों की उपेक्षापूर्ण निगाहों को निश्चय ही प्रशंसनीय नहीं मानी जानी चाहिए । इन स्थलों को भी ऐतिहासिक महत्व प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की जाती है ।

बसंतपुर दरबार क्षेत्र के आसपास ऐसे भी कई धर्मस्थलें है, जिन्हे प्रचार–प्रसार की आवश्यकता है और जो पड़ोसी देश से आनेवाले कृष्णभक्त और वैष्ण सम्प्रदाय के लोगों के लिए आस्था के केन्द्र और दर्शनीय स्थल प्रमाणित हो सकते हैं । इन स्थलों में प्रमुख हैं– सिंह सत्तल, जहां द्वारिकाधीश भगवान, श्रीकृष्ण की एक ऐतिहासिक महत्व की मुर्ति है, और नारायण मंदिर ।

इन मंदिरों के सामने भी एक–एक नाम पट्टिका लगा दी जाय और संकेत चिन्ह प्रदर्शित किए जाए तो बसंतपुर क्षेत्र के महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा करनेवाले हिंदू पर्यटक इन स्थलों की यात्रा कर अपनी काठमांडू यात्रा को पूर्णतः सफल होने का अनुभव कर सकते हैं ।
समान रूप से पश्चिम नेपाल की यात्रा में इस नियात्री को ऐसे कई झरने दिखाई पड़े, जहां पहाड़ के शिखर से जलधारा नीचे भूमि पर गिर रही थी । उन स्थलों को भी पर्यटकीय दृष्टि से विकसित करने और उसके पास पर्यटकों को कुछ क्षण विश्राम करते और प्रकृति को इस सुंदरता को निहारते हुए बिताने की सुविधाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता अनुभव की जाती है ।

पर्यटकीय वर्ष २०२० को सफल बनाने हेतु विमानस्थल के समक्ष इन पर्यटकीय स्थलों के सामने नेपाल के लोक नृत्य का आयोजना करते हुए पर्यटकों के मन को जीतने का प्रयास भी किया जाए तो यह पर्यटक दूसरी बार भी नेपाल की यात्रा में आने की योजना बना सकते हैं । नेपाल में आज भी ऐसे कई विदेशी लोग हैं, जो एक बार यहां आने पर यहां की प्राकृतिक सुंदरता, दर्शनीय वास्तुशिल्प और जनता के सद्व्यहार के कारण यहां बारबार आया जाया करते हैं । अतः पर्यटन वर्ष को सफल बनाने में काम करनेवाले निकायों को पर्यटकों के मन को जीतने का भी प्रयास करना चाहिए । सड़कों की स्तरोन्नति भी इस दिशा में महत्वपूर्ण है ।
इन सब बातों के अतिरिक्त नेपाल प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष सेप्टेम्बर २७ तारीख के दिन इसे उत्साहपूर्वक मनाता आ रहा है । सन् १९८० से मनाया जा रहा यह दिवस नेपाल के कैलेंडरों में एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में अंकित है । इन वर्षों में नेपाल की यात्रा में आनेवाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि देखी जा रही है । इस पर्यटन वर्ष के अवसर पर २० लाख पर्यटकों को आकर्षित करने का लक्ष्य बनाया गया है । नेपाल आनेवाले विदेशी पर्यटकों में सबसे अधिक संख्या भारतीयों की मानी गई है, जो हवाई मार्ग के अतिरिक्त सड़क मार्गों का भी उपयोग करते हैं ।
इसके बाद चीनी पर्यटकों का स्थान आता है । एशियाई देशों में श्रीलंका, कम्बोडिया, वर्मा के पर्यटकों के अतिरिक्त ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी और ऑस्टेलिया के लोग भी नेपाल की यात्रा में बार–बार आते हंै ।

इस प्रकार यह पाया गया है कि नेपाल के कुल ग्राहस्थ उत्पादन में पर्यटकों का उल्लेखनीय योगदान रहा है । अतः नेपाल भ्रमण वर्ष २०२० के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में नेपाल सरकार के अतिरिक्त पर्यटन क्षेत्र से संबंधित विभाग और निकायों को पर्यटकीय स्थलों की सफाई पर ध्यान देते हुए उनके महत्व को दर्शाने हेतु अंग्रेजी, हिन्दी और नेपाली भाषा में पट्टिका लगाने और उपेक्षित अवस्था में खड़े ऐतिहासिक महत्व के स्थलों और महलों को (जिसमें भिमसेन थापा का महल भी आता है) सुधारते हुए प्रस्तुत करने की योजना बनानी चाहिए, जिससे राजधानी दुर्गंधरहित, सुन्दर और चित्ताकर्षक दिखाई पड़े ।

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