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नेपाल में साजिश की शिकार हिन्दी ही नहीं मैथिली भी हुई : मुकेश झा

 

 

भाषा किसी परिचय की मोहताज नही, वह स्वयं ही अपना परिचय देती है और उसी परिचय से समाज परिचित होता है। भाषाओं में दो देश भारत और नेपाल में करीब 15 करोड़ लोगों में बोली जाने वाली भाषा मैथिली सब से मीठी भाषाओं की श्रेणी में आती है। लेकिन दुर्भाग्य कि यह भाषा लोप की दुष्चक्र में फंस गई है। वर्तमान में इस भाषा के प्रयोग से होने वाली पठन पाठन और साहित्य रचना एकदम ही न्यून हो गई है। नेपाल के विद्यालयों की पाठ्यक्रम में रहने वाली इस भाषा को करीब तीन दशक पहले ही योजनाबद्ध रूप से पाठ्यक्रम विकास शाखा के माध्यम से धीरे-धीरे हटा दिया गया। यानि भाषा को साजिश के तहत कमजोर किया गया ।
मैथिली भाषा को नेपाल के विद्यालय पाठ्यक्रम में कक्षा ९ और, १०में  ऐक्षिक विषय के रूप में रखा गया था । अधिक ऐक्षिक विषय मे मैथिली के साथ-साथ दूसरा विषय शारीरिक शिक्षा को रखा था। कितने समझदार लोगों ने यह पाठ्यक्रम बनाया था जिसमें एक साहित्य का विषय और दूसरा अन्य विषय को चुनने के लिए दिया था। साहित्य के साथ चुनने के लिए दूसरा किसी साहित्य का विषय ही होना चाहिए था जैसे मैथिली के साथ हिन्दी, भोजपुरी, नेवारी, या अन्य कोई भाषा लेकिन चूंकि मैथिली को नीचा दिखाने और विद्यालयों से हटाने के लिए यह हथकंडा अपनाया गया था।

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मैथिली विषय पूर्ण रूप से साहित्यिक विषय होने के कारण इसमे कोई प्रयोगात्मक क्रिया कलाप नही होता था और उसके लिए कोई नम्बर भी नही दिया जाता था और इसके सामने शारीरिक शिक्षा में थ्योरी में 50 पूर्णांक और प्रैक्टिकल में 50 पूर्णांक दिया गया था। ९ और १० के विद्यर्थी किसी तरह एसएलसी में अच्छा नम्बर लाना चाहते हैं इसलिए विद्यार्थी मैथिली भाषा के बजाय शारीरिक शिक्षा ही लेना पसंद करता था। जनकपुरधाम के सरस्वती माध्यमिक विद्यालय में 2049 साल में करीब 11- 12 विद्यार्थियों ने मैथिली भाषा रखा था जबकि 2050 में सिर्फ 2 ने , कारण एक ही था कि विद्यार्थी को शारीरिक शिक्षा में प्रैक्टिकल के 50 में से 45-48 नम्बर मिल जाते थे और थ्योरी में बस पास करना रहता था तो नम्बर प्रथम श्रेणी का आ जाता था।

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इस तरह साल दर साल विद्यार्थियों की संख्या घटती गई। कुछ समय बाद कई साल तक विद्यार्थी ने इस भाषा को चुनना ही छोड़ दिया, जिस कारण जो शिक्षक इस विषय को पढ़ाने के लिए नियुक्त किये गए थे उनकी नियुक्ति पर ही प्रश्न होने लगा कि जिस विषय मे विद्यार्थी ही नही है उस के लिए शिक्षक क्यों चाहिए। इस तरह धीरे-धीरे साहित्य का अत्यधिक सम्भावना वाला क्षेत्र को राज्य द्वारा निरुत्साहित करके समाप्त कर दिया गया। अगर सरकार सच्चे मन से इस भाषा को पढ़ाना चाहती तो मैथिली के साथ दूसरे किसी साहित्य के विषय जैसे हिन्दी, भोजपुरी, इत्यादि को ही रखती जिससे कई साहित्यिक सम्भावना का अवसर रहता, लेकिन दुर्भाग्य ऐसा नहीं हुवा और प्रमाणित यह किया गया कि मधेश में मिथिला में मैथिली भाषा किसी भी विद्यालय में विद्यार्थियों को पसंद नही और यह विषय स्कूल के पाठ्यक्रमों में से हटा दिया गया।

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