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नए गणतन्त्र का आन्दोलन क्यों ? : डा. सी. के. राउत



प्रस्तुति: मुरलीमनोहर तिबारी (सीपू) । हिमालिनी,अंक मार्च 2024 । आज नेपाल के राजनैतिक दल, नेता और कर्मचारीतन्त्र के स्वेच्छाचारी, तानाशाही, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के कारण देश असफल राष्ट्र बनने और अस्तित्व ही समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया है । देश विकसित होने के बजाय रसातल की तरफ जा रहा है । राष्ट्रीय योजना आयोग ने दीर्घकालीन् लक्ष्य में वि.सं.२१०० तक प्रति व्यक्ति आय १२१०० अमेरिकी डॉलर रखा जिसे पूरा करने के लिए आर्थिक वृद्धि दर निरन्तर दहाई अंक में ११% होना चाहिए लेकिन देश का आर्थिक वृद्धि दर २.२ में सीमित हो गया है । कुल ग्राहस्थ उत्पादन में उद्योग क्षेत्र का योगदान और घटते हुए १२.०% में पहुंच गया है और प्रतिव्यक्ति आय १४१० डॉलर में सीमित हो गया है । चलता हुआ उद्योगधन्धा भी सरकार बन्द कर रही हैं तब आर्थिक निवेश को भगाने का वातावरण निर्माण हो गया है । तरकारी और खाद्यान्न समेत में टैक्स लगाकर सरकार जनता से अत्यधिक कर तथा राजस्व उठा रही हैं, इसके बावजूद भ्रष्टाचार के कारण प्रहरी और कर्मचारी को तनख्वाह देने में सरकार असमर्थ है ।

कुल ग्राहस्थ उत्पादन के अनुपात में विप्रेषण आप्रवाह २२.७% है और बाँकी देनदारी का कुल ऋण ४१.२ % है । कुल ग्राहस्थ उत्पादन के अनुपात में विप्रेषण आप्रवाह ज्यादा होनेवाले देशो में नेपाल ११वें स्थान पर है । केन्द्रीय तथ्यांक ब्युरो (२०२१) के अनुसार अभी नेपाल में कुल ८६ लाख व्यक्ति ऐसे है जिनकी योग्यता और हुनर अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा है । अध्यागमन विभाग के सार्वजनिक किए तथ्यांक अनुसार सन् २०२३ में १६ लाख नागरिक विदेश गए है । रोजगार देना तो दूर की बात है, वैदेशिक रोजगार में जाने दिया जाए की मांग करने पर सरकार गोली चलाकर युवाओं की हत्या कर रही है । बहुत सारे जगहों को निषेधित क्षेत्र घोषणा करके, अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता हरण करके तथा सामाजिक सञ्जाल ऊपर नियन्त्रण करके सरकार धीरे–धीरे लोकतन्त्र का गला घोंट रही है ।

देश की शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र धारासायी होने की अवस्था में है । नेपाल के सरकारी विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है । शिक्षा तथा मानव स्रोत विकास केन्द्र के तथ्याङ्क अनुसार कक्षा १ से ५ तक मे इस वर्ष २०६९ की तुलना में १ लाख विद्यार्थी कम हुए हैं । शिक्षा तथा मानव स्रोत विकास केन्द्र द्वारा प्रस्तुत तथ्याङ्क अनुसार वि.सं २०७८ साल में कक्षा १२ तक पहुंचने पर ३३.१% विद्यार्थी ही कक्षा में उपस्थित होते है अर्थात् ६६.९% विद्यार्थी बीच में ही पढ़ाई छोड़ रहे है ।

नेपाल का स्वास्थ्य क्षेत्र खÞराब स्थिति में है । ध्ज्इ के मानक के मुताबिक, प्रति १००० की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, उस हिसाब से नेपाल में २९ हजार १६५ डॉक्टरों की जरूरत है, लेकिन सरकारी और निजी क्षेत्र में सिर्फ ३२१२ डॉक्टर ही कार्यरत हैं और ३२ साल से डॉक्टरों की दरबन्दी नहीं बढ़ाई गई हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक मानक तय किया है कि एक डॉक्टर को प्रतिदिन २० मरीजÞ देखने होंगे, पर नेपाल में एक डॉक्टर को प्रतिदिन ७० से अधिक मरीजÞ देखने पड़ते हैं । साथ ही मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक्स विभाग में एक डॉक्टर को प्रतिदिन १०० से अधिक मरीज देखने पड़ते हैं । सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सर्जरी के लिए ६–६ महीने का इंतजार करना पड़ रहा है ।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सबसे भ्रष्ट देशों में से एक है । १८० देशों के सूचकांक में डेनमार्क ९० अंकों के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश है, जबकि नेपाल १०० में से ३५ अंकों के साथ १०८वें स्थान पर है । उससे पहले ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में नेपाल के प्रधानमंत्री को भी भ्रष्टाचार का संरक्षक बताया गया है । बालुवाटार भूमि मामला, सेक्युरिटी प्रिंटिंग प्रेस घोटाला, नेपाल ट्रस्ट का भूमि किराया मामला (यति घोटाला), स्वास्थ्य आपूर्ति खरीद घोटाला (ओमनी घोटाला), नकली भूटानी शरणार्थी मामला और हवाई अड्डे पर प्रायः हर हप्ते होने वाली क्विंटल के क्विंटल सोने की तस्करी हाल के कुछ बड़े भ्रष्टाचार–घोटाले हैं । इसमे देश के शीर्ष नेताओं, मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत है । आज देश में मंत्रिपरिषद और मंत्रिमण्डल से लेकर वार्ड कार्यालय तक कोई भी ऐसा सरकारी कार्यालय नहीं है, जहां आम जनता बिना रिश्वत के अपना काम करा सके ।

देश भर में बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा कर्जदारों के खिलाफ की जा रही ज्यादतियों और अत्याचारों के कारण कई व्यापारियों ने आत्महत्या कर ली है, वे मरने और मारने की कगार पर पहुँच गये हैं ।
हालाँकि नेपाल में लोकतंत्र है कह के समझा जाता है, लेकिन इकोनॉमिस्ट ग्रूप द्वारा प्रकाशित लोकतंत्र सूचकांक के आधार पर यह पता चलता है कि नेपाल में तानाशाही और लोकतंत्र के बीच एक मिश्रित प्रणाली है और २०२२ में नेपाल ४.४९ के स्कोर के साथ १०१वें स्थान पर है । सरकार निषेधित क्षेत्र घोषित करके, प्रतिस्पर्धियों को गिरफ्तार करके और दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करके दमन करने की काम कर रही है ।

राज्य के अंग पूरी तरह असफल हो गए हैं । सबसे पहली बात तो यह है कि नेपाल की चुनाव प्रणाली अलोकतांत्रिक, विकृत और बहुत महंगी हो गयी है । लोग अपने मत का प्रयोग स्वच्छ एवं निर्भीक होकर नहीं कर पाते हैं । संसद निष्प्रभावी हो गई है और इसकी भूमिका पार्टी के चार शीर्ष नेताओं की बातों पर मुहर लगाने तक सीमित रह गई है । कार्यपालिका और उसके अंग शीर्ष राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं के भर्ती केंद्रों और भ्रातृ संगठनों तक सिमट कर रह गए हैं । न्यायपालिका में ओपन बेंच शॉपिंग के अलावा न्यायपालिका पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भर्ती केंद्र भी बन गई है, जहां से आम लोग न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते । देश के अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग, निर्वाचन आयोग समेत संवैधानिक संस्थाएं सभी राजनीतिक दलों की नियुक्तियों और सौदेबाजी का अड्डा बन गए हैं ।

देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है । नेपाल का सकल घरेलू उत्पाद ५३ खर्ब है, जिसमें से १२ खर्ब रेमिटेंस से आता है । नेपाल पर अब तक कुल कर्ज राशि २२ खर्ब से अधिक हो गई है, जो नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग ४१.२ प्रतिशत है । इस साल सरकार का वित्तीय घाटा ४ खरब ८६ अरब रुपये तक पहुंच गया है, जबकि महंगाई दर ७.७४ फीसदी है ।

भंसार विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष २०७८÷७९ में नेपाल ने करीब २० खर्ब रुपये का माल आयात किया, जबकि इसी अवधि में २ खर्ब रुपये का निर्यात किया । कुल विदेशी व्यापार में आयात का हिस्सा ९० प्रतिशत से अधिक और निर्यात का हिस्सा १० प्रतिशत से कम है । चालू वित्तीय वर्ष की जनवरी तक की अवधि में नेपाल में ७ खर्ब ६८ अरब रुपये का माल आयात किया गया, जबकि इसी अवधि में नेपाल से ७४ अरब ९६ अरब रुपये का निर्यात किया गया ।

पांच साल में कृषि उत्पादों का आयात ५७.४९% बढ़ा है । केंद्रीय भंसार विभाग के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में नेपाल में ३ खर्ब ५५ अरब १३ करोड़ ६१ लाख मूल्य के कृषि सामान का आयात किया गया था । पांच साल पहले वित्तीय वर्ष २०७४–७५ में नेपाल ने केवल २ खरब ४ अरब मूल्य के कृषि उत्पादों का आयात किया था । दूसरी ओर, नेपाली किसान सब्जियों, दूध आदि की कीमत नहीं मिलने पर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन कोई भी राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे पर बोलने से भी डर रहा है ।

चारों ओर असंतोष और नाराजगी

आज देश में हर तरफ असंतोष, निराशा, गुस्सा है । इस बात पर विचार करना जरूरी है कि आज जनता विभिन्न रूपों और समूहों में आन्दोलित हैं, लेकिन आंदोलन सफलता की ओर क्यों नहीं बढ रहा है ?
इसका पहला कारण हैः राजनीतिक व्यवस्था के मामले में हम लगभग ‘डेड–इंड’ (बन्द गली) में पहुँच चुके हैं । नेपाल की जनता ने बहुत कम समय मे ही राजतंत्र, राणातंत्र, प्रजातंत्र, गणतंत्र, लोकतंत्र और संघवाद का अनुभव किया है । विश्व में सर्वोत्तम मानी जाने वाली संघीय लोकतांत्रिक गणतांत्रिक व्यवस्था आ चुकी है । अब यहां से नहीं हुआ तो कहां जाएं, मांग क्या होगी, आंदोलन कहां खत्म होगा, इसे लेकर लोगों में असमंजस है । दूरदर्शी राजनीतिक दर्शन और रोडमैप के अभाव में आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता, चाहे इसके लिए कितना भी छटपटाया जाए ।

दूसरा कारण, कुछ राजनीतिक दल या समूह लोगों के असंतोष और आक्रोश को पीछे की ओर मोड़ना चाहते हैं । कुछ लोग सुनियोजित तरीके भाष्य निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं कि यह व्यवस्था खÞराब है और राजतन्त्र की व्यवस्था ही बेहतर थी । जिन लोगों ने पुरानी व्यवस्था का अनुभव नहीं किया है या जो वर्तमान व्यवस्था से असन्तुष्ट हैं, वे क्षण भर के लिए गुस्से में तो इससे सहमत हो सकते हैं, लेकिन आंतरिक अवचेतन में वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं । इसी कारण से, चाहे कुछ शक्तियों ने वर्तमान व्यवस्था को उलटने की कितनी भी कोशिश की हो, वे असफल रहे हैं ।

तीसरा, कुछ समूह या शक्तियों द्वारा धर्म की आड़ में वर्तमान व्यवस्था के प्रति असंतोष को आन्दोलन का स्वरूप देने की कोशिश हो रही है । मगर अभी का नेपाली पीढ़ी के लिए रोजगार और आर्थिक विकास प्रधान मुद्दा है, जिसके कारण से वे धर्म के मुद्दे को गौण मुद्दा के रूप में देखते हैं । सिर्फ धार्मिक राज्य बन जाने से ही अपने लिए रोजगारी और आर्थिक समृद्धि नही आएगी, विदेश पलायन से नही रोक पाएगी, स्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य नही मिलने लगेगी, इस विषय को वे अच्छी तरह समझते है । इसी कारण कुछ समूह विभिन्न हथकण्डा अपनाकर, धर्म को आन्दोलन का आधार बनाने के बाबजूद भी वे सफल होते नहीं दिख रहे हैं ।
चौथा, सहकारी समितियों और बैंकों का कर्ज न चुकाने जैसी मांगों के साथ भी कुछ लोग आंदोलन करना चाह रहे हैं पर सफल नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि अंततः जनता का दिल कह रहा है कि अराजकता किसी के हित में नहीं है ।

पांचवां, आंदोलन का नेतृत्व जिम्मेदार और बेदाग नहीं देखा गया । जिन लोगों ने आंदोलन शुरू किया या उठाना चाहा वे स्वयं अराजक थे, किसी भी कीमत पर हिंसा और दंगे के इच्छुक थे, स्वयं कई अनैतिक आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में शामिल थे । उनमें से कुछ दोहरे चरित्र के प्रतीत होते थे– एक ओर, संघवाद को अस्वीकार करते थे तो दूसरी ओर प्रांतीय विधानसभा के अध्यक्ष स्वयं पाने का प्रयास करते थे, एक ओर राजशाही की मांग करते थे पर वहीं गणतांत्रिक शक्तियों के साथ मिलकर सरकार में भी थे ।

छठा कारण, आंदोलन के लिए आवश्यक सशक्त संगठन, जनशक्ति, कार्यकर्ता और प्रशिक्षण नहीं होना है । संगठन के अभाव में आंदोलन ४–५ दिन तक चल सकता है, क्रोधित भीड़ ४–५ दिन के लिए सड़कों पर आ सकती है, लेकिन दीर्घकालिक आंदोलन के लिए संगठन की जरूरत होती है, प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की जरूरत होती है । सत्ता परिवर्तन और शीर्ष नेताओं के सिंडिकेट को तोड़ने में २–४ दिन के सड़क प्रदर्शन सफल नहीं होंगे, इसमें महीनों और शायद साल भी लग सकते हैं । आपको आंदोलन के कई चरणों से गुजरना होगा, आपको कई गिरफÞ्तारियाँ, कारावास और यहाँ तक कि राज्य की यातना भी सहनी पड़ सकती है । इसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि दो–चार दिन की रैली के बाद पुरानी पार्टियां राज्य की सत्ता छोड़ देंगी ।

इसलिए आंदोलन की तैयारी करते समय आपको इन बातों पर विचार करके, कमियों को सुधारकर, दीर्घकालिक रोडमैप बनाकर, संगठन का विस्तार और प्रशिक्षण करके आगे बढ़ना होगा । लेकिन आंदोलन का कोई विकल्प नहीं है । अब यदि लोग देश के विकास के लिए खड़े नहीं हुए तो इस देश का अस्तित्व ही समाप्त होनेवाला है । अब तक लोग अलग–अलग नेताओं और पार्टियों के लिए कई बार आन्दोलन कर चुके हैं, पर अब देश की अर्थव्यवस्था सुधारने, सुशासन और रोजगार लाने तथा अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए आन्दोलन करना जरूरी है ।

नई पार्टी से यह व्यवस्था संभव नहीं है

देश पुराने शीर्ष नेताओं के सिंडिकेट के तहत चल रहा है और देश की पूरी व्यवस्था जर्जर है । देश की जनता इतनी विघ्न–निराश हैं कि उन्होंने २०७९ के आम चुनावों में वैकल्पिक नई पार्टियों के लिए अच्छा मतदान किया । अपनी स्थापना के कुछ ही महीनों के भीतर, नई पार्टियों को अच्छे वोट मिले । प्रतिनिधि सभा के चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को ११ लाख वोट (कुल २० सीटें), जनमत पार्टी को ४ लाख (कुल ६ सीटें) और नागरिक उन्मुक्ति पार्टी को लगभग ३ लाख (कुल ४ सीटें) मिले । राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से लोगों की उम्मीदें बहुत अधिक थीं । वह २० सीटें भी जीती फिर भी उनके लिए नेपाल की संसदीय राजनीति को प्रभावित करने का अवसर बहुत कम है । चूंकि २० सीटों की प्रासंगिकता निर्णायक नहीं है, इसलिए सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने, सरकार से कोई बदलाव लाने या संसद से कोई बदलाव लाने की उम्मीदें धराशायी हो गई हैं । यदि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की २०–२१ सीटों से कुछ नहीं हो पा रही है, तो जनमत पार्टी या नागरिक उन्मुक्ति पार्टी की ६ या ४ सीटों से कुछ होने का सवाल ही नही उठता ।

हाल ही में, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का नेतृत्व पासपोर्ट घोटाले, ऑडियो प्रकरण और सहकारी घोटाले जैसे कई घोटालों में फसने से इसके नेतृत्व पुराने पार्टी के चक्रव्यूह से घिरने की अवस्था है । ऐसे में अगर रास्वपा पुरानी पार्टी के खिलाफ गए तो, उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डालने की प्रबल संभावना है, जिसके कारण देश के बड़े भ्रष्टाचार घोटालों में भी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को चुप रहना पड़ा है । इसकी पुष्टि सभापति लामिछाने ने राज्य व्यवस्था एवं सुशासन समिति की बैठक में की, जब उन्होंने बालकुमारी कांड में राज्य के दो युवकों की हत्या के मामले में गृह प्रशासन को दोषी ठहराने की कोशिश की । इसलिए, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी एक मजबूर स्थिति में है– भले ही वह लोगों को दिखाने के लिए दो–चार शब्द कहे, लेकिन वह पुरानी पार्टियों और नेताओं के खिलाफ ठोस रूप से नहीं जा सकती । दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के पास आगे बढ़ने के लिए कोई गंभीर अनुभव, रोडमैप, राजनीतिक दर्शन या आर्थिक नीति नहीं है । किसी को खाली प्रधानमंत्री बना देने से समस्याएँ जादू की छड़ी की तरह हल नहीं होने वाली हैं । नेपाल की मौजूदा स्थिति में देश को प्रधानमंत्री नहीं चला रहे हैं, छोटे–छोटे मामलों में भी प्रधानमंत्री सिंह दरबार के अंदर बेबस नजर आते हैं ।

नागरिक उन्मुक्ति पार्टी की भी यही स्थिति है । उसे डर है कि माओवादी नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर माफी पाने वाले संरक्षक श्री रेशमलाल चौधरी को किसी भी समय फिर से जेल में डाल दिया जाएगा, अगर उन्होंने थोड़ा सा भी विरोध किया । इसी कारण से, चाहे गठबंधन की बैठकें हों या सरकार में, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी बोलने में भी असमर्थ है और गठबंधन के निर्देशों का सख्ती से पालन करने के लिए मजबूर है । सरकार लगातार जनमत पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का दमन कर रही है । बारा के उपचुनाव में सरकार और गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने खुलकर जनमत पार्टी का विरोध किया और जनमत पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सी.के.राउत को पुलिस ने घेरने में भी परहेज नहीं किया । राष्ट्रीय पोशाक दिवस के अवसर पर जनमत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनकी पार्टी की संघीय मंत्री को गिरफ्तार करने में भी सरकार पीछे नहीं हुई । माघ ८ गते को शिक्षा मंत्री सहित मधेश प्रांत के सांसदो के सिर पर लाठियां बरसाकर क्रूर दमन करने में भी सरकार को कोई संकोच नहीं हुआ । इसलिए नई पार्टियों के लिए मौजूदा संसद या सिस्टम से कुछ भी करने की स्थिति नहीं है.
पुरानी पार्टियों के नये किरदारों से भी कुछ भी संभव नहीं है

अब बचे हैं पुरानी पार्टी के नए किरदार, जिनके नाम प्रायोजित रूप में अक्सर मीडिया में उछलते रहते हैं । लेकिन वे कितना भी उछल–कूद करें, उनमें अपनी पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करने का साहस नहीं है, यदि वे ऐसा करते हैं तो वे संसद और व्यवस्था से बाहर हो जायेंगे और शक्तिहीन हो जायेंगे । इसका उदाहरण उपराष्ट्रपति चुनाव है । मुख्य दल की अधिकतर महिला सांसदों ने अपनी राय व्यक्त की कि उपराष्ट्रपति एक महिला होनी चाहिए, लेकिन जब वोट देने की बारी आई तो उन्होंने पुरुष उपराष्ट्रपति उम्मीदवार को ही वोट दिया । यही बात अन्य सांसदों पर भी लागू होती है । वे संसद में या मीडिया में कितना भी जोर से चिल्ला लें, महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी पार्टी के खिलाफ जाने का साहस करने की सोच भी नहीं सकते । दूसरी बात यह है कि उन पुरानी पार्टियों के नए और युवा नेताओं ने भी अपने शीर्ष नेतृत्व की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए खुद को तैयार कर लिया है, जिसकी उन्हें स्कूलिंग मिली है, चाहे वह भ्रष्टाचार, पार्टी का दावपेंच और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मामला ही क्यों न हो ।

२०८४ समाधान नहीं है

संवत २०७९ के आम चुनावों से उभरी कुछ पार्टियाँ अब ‘मिशन ८४’ की दुहाई दे रही हैं और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ होते हुये उम्मीद करने को मजबूर हैं । लेकिन मिशन ८४ महज एक भ्रम है । जनता द्वारा चाहा गया निकास और विकास वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था के साथ संभव नहीं है । वर्तमान संसदीय प्रणाली में यह संभव नहीं है । २०८४ में भी कोई नई पार्टी अचानक दो–तिहाई सीटें संसद में ले आएगी, यह एक कल्पना के अलावा और कुछ नहीं हो सकता । ज्यादा से ज्यादा २०–३० सीटें उपर नीचे होंगी पर सरकार पुरानी पार्टियों के गठबंधन की ही बनेगी । दूसरी बात, अगर नई पार्टियों को दो–तिहाई सीटें मिल भी गईं तो भी पुरानी पार्टियां चुप नहीं बैठेंगी । पहले तो वे नतीजे घोषित नहीं होने देंगे, अगर नतीजे घोषित हुए तो वे यह कह कर नतीजे रद्द करने की मांग करेंगे कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है । यदि नई पार्टियाँ इससे बच जाती हैं, तो पुरानी पार्टियाँ अपने भातृ संगठनों और पार्टी कार्यकर्ताओं को हर जगह इस्तेमाल करके, मंच को घेरकर, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करके कभी भी स्थिर रूप से काम करने का माहौल नहीं देंगी । आखÞिरकार, पुरानी पार्टियों ने सेना और पुलिस में अपनी संरचनाएँ खडी की हुई हैं । उसी प्रकार कर्मचारियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों के भी बीच में भी हर जगह उनके अपने वफादार मोर्चे हैं जो अपने नेता के आदेश पर मरने–मारने को तैयार हैं, देश में आतंक फैलाने के लिए तैयार हैं ।

सड़क आन्दोलन का कोई विकल्प नहीं है

अगर चुनाव और संसदीय प्रणाली के गणित के जोड़बल से बचने का कोई रास्ता है तो वह सड़क आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं है । व्यवस्था और स्थिति को बदलने के लिए एक तरीका यह हो सकता है कि नेपाल के संसद से संविधान को संशोधन कर उसे लागू करने के लिए कहा जाए, लेकिन इसके लिए संसद में दो–तिहाई सदस्यों की आवश्यकता होगी, उसके अलावा कुछ असंशोधनीय प्रावधान भी हो सकते हैं । पर जब संसद पर पुरानी भ्रष्ट पार्टियों और नेताओं का कब्जा है और उनका चाबुक चल रहा है । संसद से कोई मांग पर विचार होगा, ऐसा नहीं लगता है । चूंकि संसद में सभी प्रमुख दल और उनके शीर्ष नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और कई आपराधिक मामलों में शामिल हैं, इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं है कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संसद द्वारा कोई विधेयक पारित किया जाएगा । दूसरा, यदि हम सशस्त्र आंदोलन का रास्ता चुनते हैं, तो नेपाल में सशस्त्र आंदोलन सफल नहीं होगा और नेपाल फिर दूसरी सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार नहीं है । खासकर ९÷११ की घटनाओं के बाद तो यह कल्पना ही नहीं की जा सकती कि नेपाल में सशस्त्र आंदोलन सफल हो पाएगा ।

तो अंततः नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन के लिए सड़क आन्दोलन ही अंतिम विकल्प है । नेपाल में जो भी राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं वे सड़कों के माध्यम से हुए हैं । यहां तक कि जब माओवादी सशस्त्र संघर्ष में १७,००० लोग मारे गए, तब भी कुछ भी संस्थागत नहीं हो सका, और अंततः आठ पार्टियों के सड़क विरोध प्रदर्शन के बाद ही संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई । इसलिए शांतिपूर्ण सड़क आंदोलन का कोई अन्य विकल्प नहीं है और इसे अपनाकर देश के विकास आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए । शांतिपूर्ण आंदोलन से परिवर्तन संभव है । १९६६ से १९९९ तक, निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए ६७ आंदोलनों में से ५० में शांतिपूर्ण आंदोलनों ने अग्रणी भूमिका निभाई ।

आंदोलन की मांग

देश के संविधान के अनुसार संघीय लोकतांत्रिक गणतांत्रिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए, जनता में निहित संप्रभुता का उपयोग करते हुए, नेपाल के संविधान के धारा १७ द्वारा दी गई, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने की स्वतंत्रता के अनुसार आंदोलन को आगे बढ़ाया जाए । देश में मौजूद उपरोक्त समस्याओं को एक–एक करके हल करने की आंदोलन की मांगें इस प्रकार हो सकती हैंः–
१. नेपाल के संविधान के धारा २ के अनुसार, नेपाल की संप्रभुता और राज्य शक्ति नेपाली जनता में निहित है । , इसलिए संप्रभुता वास्तविक रूप में जनता के पास आनी चाहिए और जनता प्रत्यक्ष लोकतंत्र के माध्यम से इसका उपयोग करने में सक्षम होने चाहिए । पार्टियों और नेताओं के बंधकों और सिंडिकेट से देश की जनता को मुक्त करते हुये वास्तविक लोकतंत्र यानि जनता की संप्रभुता स्थापित करना ।

२. नेपाल में द्विसंसदीय व्यवस्था समाप्त कर लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित एकसंसदीय व्यवस्था बनायें । एक ऐसा संसद हो जहाँ सांसद् किसी भी समूह या पार्टी के दबाव या ह्वीप से मुक्त होकर, जनता के लाभ के लिए तेजी से कानून बना सके । जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण या गैर–भौगोलिक या जातिगत निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था करना । जनता के सीधे मतदान द्वारा भी विधेयक या प्रस्ताव पारित होने की व्यवस्ता करना ।

३. जनता के द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधान मंत्री, उप प्रधान मंत्री, मुख्य चुनाव आयुक्त, महालेखा परीक्षक, अटॉर्नी जनरल और अख्तियार दुरूपयोग अनुसन्धान आयोग के प्रमुख हो । प्रधान मंत्री को विभागीय कार्य करने के लिए अलग–अलग विभागीय मंत्री रखने के बजाय विशेषज्ञता के आधार पर विशेषज्ञों को मन्त्रालय चलाने के लिये नियुक्त करना चाहिए । जनता से सीधे निर्वाचित पदों पर संसद द्वारा महाभियोग नहीं लगाया जा सके, क्योंकि किसी सीमित नेता या जन प्रतिनिधि पर निर्भर रहने के बजाय तमाम जनता के वोट को सर्वोच्च माना जाना चाहिए । निर्वाचित पद से हटाने के लिए भी पुनः चुनाव की आवश्यकता हो– वह प्रस्ताव एक निश्चित अवधि के बाद संसद के दो–तिहाई मत या पाँच लाख लोगों के हस्ताक्षर के द्वारा लाने का प्रावधान हो प्रांतीय सरकारों में मुख्यमंत्री और उप–मुख्यमंत्री के लिए भी सीधे निर्वाचन होने का प्रावधान हो, प्रदेश में भी कोई दूसरा मंत्री नहीं हो, विशेषज्ञों द्वारा मन्त्रालय चलाने का प्रावधान हो ।

४. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित ७ सदस्यीय न्यायाधीशों का चुनाव सीधे उन उम्मीदवारों में से किया जाय जिन्होंने निर्धारित व्यावसायिक योग्यता प्राप्त कर ली है । यदि न्यायाधीश किसी समूह या पार्टी से संबद्ध पाए गए तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाए ।

५. कर्मचारीतंत्र में किसी भी दलियकरण और सामूहिक सौदेबाजी को प्रतिबंधित किया जाए और निजी क्षेत्र की तरह ‘हायर एंड फायर’ को अपनाया जाए ।

६. क्योंकि देश में मिश्रित आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से विफल हो रही है और राज्य के हाथों में सरकारी स्कूल, अस्पताल, उद्योग, निगम और संस्थान सभी पूरी तरह से विफल, खराब गुणवत्ता वाले और घाटे में हैं, इससे देश की आर्थिक व्यवस्था खराब हो रही है, इसलिये देश की आर्थिक व्यवस्था सामाजिक लोकतंत्र के निकट हो । उत्पादन प्रणाली निजी क्षेत्र को दी जाए लेकिन राज्य द्वारा विनियमित हो और राज्य यह सुनिश्चित करे कि कोई भी नागरिक मौलिक अधिकारों से वंचित न रहे । दलाल, उपभोक्तावादी एवं वित्तीय पूंजीवाद को अस्वीकार कर उत्पादनोन्मुख अर्थव्यवस्था पर बल देते हुए राष्ट्रीय पूंजी निर्माण पर बल दिया जाए । देश में उत्पादन को प्राथमिकता देने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए । यह पूंजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के बीच ‘तीसरा रास्ता’ होगा । दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में शामिल नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और फिनलैंड में ऐसी सामाजिक लोकतन्त्र की व्यवस्था मौजूद है ।

७. ‘कांफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ (स्वार्थ–संघर्ष) की अवधारणा को देश में व्यापकता दिया जाए और किसी भी क्षेत्र में स्वार्थ का टकराव न हो इसे सुनिश्चित किया जाए ।

८. आंदोलनकारियों के नेतृत्व में सरकार बने जिसका मुख्य काम चुनाव संपन्न कराना होगा । वि.सं. २००७, २०४६ या २०६३ की तरह यह सर्वदलीय और सर्वपक्षीय नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व में ही होना चाहिए, अन्यथा पुराने तत्व बने रहेंगे, जिससे परिवर्तन का कोई संकेत नहीं मिलेगा और हमेशा प्रतिगमन का खतरा रहेगा ।

९. आंदोलनकारियों की ओर से पूर्ण शक्तियों से युक्त एक राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (ट्राइब्यूनल) का गठन किया जाना चाहिए– जो सरकार, राजनीतिक दलों और शीर्ष नेताओं की संलिप्तता और संरक्षण से होने वाले सभी भ्रष्टाचारों, अनियमितताओं और दण्डमुक्ति की जाँच कर सके और दंडित कर सके ।

अतः इन मांगों पर आधारित आंदोलन ‘द्वितीय गणतंत्र’ और ‘सामाजिक लोकतंत्र’ के लिए होगा । जनमत पार्टी ने १५ ज्येष्ठ २०८१ को ‘गणतंत्र दिवस’ के दिन काठमांडू के भृकुटी मंडप में एक आम करके आंदोलन शुरू करने की घोषणा भी कर दी है और घर–घर जाकर प्रचार भी कर रही है. काठमांडू में घर–द्वार कार्यक्रम भी कर रही है । यह कुछ लोगों को अजीब लग सकता है, लेकिन फÞ्रांस में अभी पांचवें गणतंत्र चल रहा है । क्रांति की जननी कहे जानेवाली फ्रांसीसी क्रांति के बाद फ्रांस में प्रथम गणतंत्र की स्थापना हुई, सन् १९५८ के बाद विभिन्न सुधारों के साथ पांचवें गणतंत्र की स्थापना की गई ।
(२०८० माघ २१ गते जनमत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सी.के. राउत द्वारा प्रस्तुत “आखिर नेपाल विकसित क्यों नहीं हुआ ? ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ दृष्टिकोण और ‘नए गणतंत्र एवं सामाजिक लोकतंत्र की लड़ाई’ नामक राजनीतिक प्रस्ताव का सारांश)

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

अनुवादःतथा प्रस्तुति : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
राजनीतिक समिति सदस्य, जनमत पार्टी



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