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किस खेत की मूली हो : वसन्त लोहनी

 

किस खेत की मूली हो

टुकड़ों में जीने वाले
पूछो तुकबंदी वाले से
जो हर दिन
सुनाते आ रहे हैं
आज भी सुना रहे है
अभी भी सुना रहे हैं
अगर घर में चावल नहीं हैं
तो सिर्फ खबर कीजिए
चावल पहुंच जाएगा
लेकिन –
जब से लकडाउन ने काम छिना
भूखे मजदूरों के कतार
हजारों हजार
भूखे भूखे
रसद के लिए
पैदल गांव जा रहा है
और सरकार की पुलिस
उनके पीछे ऐसे लगी हैं
जैसे जानवर तरह

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मजदूर एक हो, हम शिकंजा तोड़ेंगे
रट-रट कर, रटा-रटा कर
सत्ता संभालने वाले
मजदूर को ही आखेट कर रहे हो
अपने ही मुल्क आने वाले को
नदी के उस पार रोक दिए
अमानवीय ढंग से , जानवर की तरह
गांव जाने वाले को
अंदर ही रोक दिए
पहाड़ियों पर, हर बस्ती पर,
हर पैदल रास्ते पर
पुलिस पीछे लगीं रही हैं
जैसे कि वह अपराधी हो
कालाबाजारी – अपराधी को
नोटवा के बल पर
सेटिंग मिलाकर छोड़ रहे हैं
तूकबंदी वाले आराम फरमा रहे हैं
और अपनी सचिवालय की रक्षा में
हैकर की सुरक्षा कवच बनने के लिए
झूठ फरेबी चुटकुले खेलते खेलते खुद चुटकुले बन गए हैं
ए कानून के बात करने वाले
ए कानून के रखवाले
सर्वोच्च अदालत को अबज्ञा कर रहे हो
कानून तो पॉकेट में डाला हुआ है
जब चाहे जैसे चाहे निकलता जा रहा है
कानून के नहीं
जनता के नून के बात करो
कानून सम्मत तो जब चाहे बना सकते हो
चुटकी में
अभी जरूरत है नून सम्मत बनाने की

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भूखे पेट को रोटी दो
नही तो –
हर अजनबी के
धीमा और कमजोर आवाज
ऐसे आवाज बनकर गूंज उठेगा
मुल्क के धरती तो क्या
आकाश भी काप उठेगा
अरे तुकबंदी वाले
खुद ही एक तुक्का हो
अजय शक्ति के सामने
किस खेत की मूली हो

वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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