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खूब करने लगी हूँ इश्क कलम और किताब संग.. हाँ मैं जीने लगी हूँ : सविता वर्मा “ग़ज़ल”

 

हाँ मैं जीने लगी हूँ”

सविता वर्मा “ग़ज़ल”

खुद ही खुद में खोने लगी हूँ..
हाँ!
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।
देखकर आईना आंखों मेंकजरा
और माथे पर उगता सूरज
सजाने लगी हूँ ..
हाँ !
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।
पढ़ने लगी हूँ प्रेम ग्रन्थ जो
जगाते हैं मुझमें स्वयं से प्रेम करने की ललक
भूली थी खुद को अब
मैं रूबरू खुद से होने लगी..
हाँ !
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।
भीड़ से दूर रहना भाता हैं
मुझे हमेशा ही।
अकेले-अकेले अब मुस्कुराने लगी हूँ।
हाँ!
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।
किसी ने टोका उम्र के इस पड़ाव पर
मत लिखा करो शायरी ..
अरे ! यही तो वो पड़ाव हैं
जब खुद के लिये नहीं चुराना
पड़ता समय।
इस पल को एक प्रेम गीत सा होठों पे
सजाने लगी हूँ..
हाँ !
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।
खूब करने लगी हूँ इश्क
कलम और किताब संग
दास्तान-ऐ-इश्क लिखने लगी हूँ..
हाँ!
मैं थोड़ा-थोड़ा जीने लगी हूँ।।

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