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भारत के जलमार्ग ग्रिड परियोजना से बांगलादेश, भूटान के साथ ही नेपाल को भी होगा फायदा

 

 

भारत के विभाजन के पहले गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना का विशाल डेल्टा परिवहन का मुख्य मार्ग हुआ करता था। 70 प्रतिशत से अधिक माल का परिवहन इसी रास्ते से हुआ करता था। हालांकि अब यह घटकर दो प्रतिशत हो गया है। इस डेल्टा को साझा करने वाले भारत और बांग्लादेश मिलकर इसे पुराने स्वरूप में लाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे लगभग 3,500 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में जहाजों का संचालन हो सकेगा। इससे भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार के बीच भी संपर्क बढ़ेगा। एक अनुमान के अनुसार इससे लगभग 60 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे।

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आब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन के एक शोध के अनुसार उत्तर-पूर्वी राज्य समुद्री मार्ग से जुड़ सकें, इसके लिए भारत सहित बांग्लादेश और म्यांमार के उन बंदरगाहों पर ध्यान देना जरूरी है, जिनके जरिए समुद्री संपर्क स्थापित हो सकता है। इनमें भारत में कोलकाता व हल्दिया, बांग्लादेश में चिटागांग और म्यांमार में सितवे बंदरगाह हैं। इन्हें पूर्वोत्तर के आंतरिक क्षेत्रों से जोड़ने की परियोजना पर काम किया जा रहा है।

मोंगला बंदरगाह: बांग्लादेश की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद की कार्यकारी समिति ने 2020 में मोंगला बंदरगाह की क्षमता बढ़ाने से संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत राशि 6,014 करोड़ टका (बांग्लादेशी मुद्रा) है। भारत भी 41.20 अरब रुपये की भागीदारी करेगा।

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मोंगला बंदरगाह चिटागांग बंदरगाह के बाद बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है। इसकी क्षमता में वृद्धि होने पर यह 15 मिलियन टन कार्गो और 20 फीट आकार के चार लाख शिपिंग कंटेनरों को संभालने में सक्षम होगा। यह परियोजना जून, 2024 तक पूरा होने की उम्मीद है।

एक शोध में कहा गया है कि उत्तर-पूर्वी राज्य समुद्री मार्ग से जुड़ने के लिए बांग्लादेश और म्यांमार का ध्यान देना जरूरी है। उन बंदरगाहों पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए जिनके जरिए समुद्री संपर्क स्थापित किया जा सकता है।

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