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मधेश को विकास चाहिये पर अस्तित्व को गिरवी रखकर नहीं, राजपा का दृढ निर्णय स्वागत योग्य : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | विषम परिस्थितियों में भी राजपा नेपाल ने जो दृढ निर्णय लिया है वह स्वागत योग्य है । यह सच है कि मधेश की जनता विकास चाहती है पर अपने अस्तित्व को गिरवी रख कर नहीं । क्योंकि सरकार और केन्द्रीय दलों की जो दोधारी नीति है वह तो स्पष्ट दिखाई दे रही है । ये मधेश की माँग को सम्बोधन करना ही नहीं चाहते क्योंकि इनकी नीयत नहीं है । कहते हैं जहाँ चाह वहाँ राह, पर जहाँ नीयत नहीं वहाँ कोई सम्भावना नहीं । स्थानीय निकाय का चुनाव ही नहीं मधेश को आने वाले सभी चुनावों का भी वहिष्कार करना चाहिए अगर उनकी माँगों को उचित सम्बोधन नहीं मिलता है तो । बहस जारी है कि अगर राजपा बहिष्कार करती है तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । कहने वाले भले ही यह कह कर खुद को संतोष देते हों पर सच तो यह है कि अगर मधेश की माँगों को सम्बोधन के बगैर राजपा चुनाव में जाती है तो वह आत्मघाती कदम होगा । मधेश को विकास के सपने दिखाकर जो तानाबाना बुना जा रहा है उसमें कहीं कोई दम नहीं है । बीस वर्षों से अगर मधेश स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों के बगैर चला है तो कुछ वर्ष और सही । वैसे भी ये प्रतिनिधि क्या कर रहे हैं उसका नमूना तो अब से दिखने लगा है । देश चंद पार्टियों के हाथों का खिलौना बना हुआ है जिससे वो खेल रहे हैं और अपना जी बहला रहे हैं जिसमें सबसे सस्ता खिलौना इन्होंने मधेश को बना रखा है । जब जी चाहा मौत बाँट दी और जब मतलब याद आया तो गले लगा लिया । कड़वा सच तो यह है कि मधेशी जनता को भी खिलौना बनना ही भाता है ।
राजपा अगर यथास्थिति में टिकी रही तो जिस मधेश के अस्तित्व से विश्व परिचित हुआ है वह विश्व यह भी देखेगा कि नेपाल के लोकतंत्र का सच क्या है ? किस तरह नेपाल की आधी आबादी को उसके हक से वंचित करने की साजिश की जा रही है ? किस तरह उन्हें उनके मौलिक अधिकार के प्रयोग से रोका जा रहा है ? जब देश आपकी बात ना सुने तो अपनी बात अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाना स्वाभाविक हो जाता है । मधेश आन्दोलन ने विश्वपटल पर मधेश की उपस्थिति दर्ज करा दी है । इसलिये भी आवश्यक है कि विभेद की इस नीति को अन्तर्राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाय । आखिर क्यों यह जिद है कि चुनाव के बाद मधेश के मुद्दों को सम्बोधित किया जाएगा ? अगर आपकी नीयत सही है तो यह आज ही सम्भव है । चीन यात्रा से पहले एमाले अध्यक्ष के दिल में अनायास ही मधेश प्रेम उत्पन्न हो गया था पर वापसी के बाद फिर से इनके सुर बदल गए हैं । कुछ तो है जो भले ही दिख नहीं रहा पर, जो है उसका अंजाम नेपाल की धरती पर सही परिणाम नहीं लाएगा यह तो तय है ।
आज की स्थिति में राजपा से जो उम्मीदें मधेश ने जोड़ रखी हैं उसके लिए राजपा को अपनी सुदृढ नीति और पारदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है । परिवारवाद और व्यक्तिगत स्वार्थ या सोच से ऊपर इन्हें उठना होगा । वरना हश्र सबको पता है । क्योंकि यह तो तय है कि तीन बड़ी पार्टियाँ राजपा के बिखरने का इंतजार कर रही हैं और इसके लिए प्रलोभन के पाशे भी फेके जा रहे हैं या फेके जाएँगे, जिससे इन्हें बचना होगा । क्या फर्क पड़ता है कि इन्हें तत्काल शक्ति नहीं मिलती या सत्ता नहीं मिलती पर आनेवाला कल इनका ही होगा । इतिहास गवाह है कि अधिकार और अस्तित्व प्राप्ति की लड़ाई लम्बी चली है । इन्हें जनता के बीच जाना चाहिए । आज इनका धैर्य, कल मधेश के हित में परिणाम लाएगा । पर अगर ये मुद्दों को गिरवी रखकर समझौता करते हैं तो यह लड़ाई फिर से वहीं पहुँच जाएगी जहाँ से शुरु हुई थी और फिर मधेश को सम्भालना मुश्किल हो जाएगा ।

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