Wed. Apr 29th, 2026

साहित्य

यकीं का यूँ बारबां टूटना (ग़ज़ल) : डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

 

यकीं का यूँ बारबां टूटना आबो-हवा ख़राब है मरसिम निभाता रहूँगा यही मिरा जवाब है मुनाफ़िक़ों की भीड़ में कुछ नया न मिलेगा ग़ैरतमन्दों में नाम गिना जाए यही ख़्वाब है दफ़्तरों की खाक छानी बाज़ारों में लुटा पिटा रिवायतों में फँसा ज़िंदगी का यही हिसाब है हार कर जुदा, जीत कर भी कोई तड़पता रहा नुमाइशी हाथों से फूट गया झूँठ का हबाब है धड़कता है दिल सोच के हँस लेता हूँ कई बार  तब्दील हो गया शहर मुर्दों में जीना अज़ाब है ये लहू, ये जख़्म, ये आह, फिर चीखो-मातम तू हुआ न मिरा पल भर इंसानियत सराब है  फ़िकरों की सहूलियत में आदमियत तबाह हुई  पता हुआ ‘राहत’ जहाँ का यही लुब्बे-लुबाब है  

इसी तरह धीरे-धीरे ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं, इसी तरह धीरे-धीरे मरता है आदमी : अमरजीत कौंके

 

धीेर-धीरे अमरजीत कौंके इसी तरह धीरे-धीरे ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं इसी तरह धीरे-धीरे मरता है

ए कैसी जहेर भरी आज की सियासत है, हमी लुटे है हमी पर है लूट का इल्जाम : गुल्जारे अदब की गजल गोष्ठी सम्पन्न

 

नेपालगञ्ज ,(बाँके) पवन जायसवाल । बाँके जिला के गुल्जारे अदब नेपालगन्ज ने शनिवार को मासिक

अंग्रेजी से हमे बैर नही पर प्रभुत्व उसका स्वीकार नही : श्रीगोपाल नारसन

 

विश्व हिन्दी दिवस का पावन पर्व मुबारक हो उर्दू,मराठी,मलयालम बंगाली,तेलगु,कन्नड़ भी क्षेत्रीय भाषा साथ चले

सम्पूर्ण सौन्दर्य का, पूंजीभूत तत्त्व, समाया है तेरे वजूद में :डॉ वन्दना गुप्ता

 

माेरपंखी स्पर्श – डॉ वन्दना गुप्ता मुँह धोये सवेरे में, जब सूर्य की अनुपम किरणें,

चिरप्रतीक्षित-कथा कौमुदी, काव्य कलश, सीप के मोती, और हास्य के रँग, चारों साझा सँकलनों, का लोकार्पण

 

अनुराधा प्रकाशन द्वाराप्रकाशित 4 साझासंकलनों का लोकार्पण, कवि एंव पत्रकार लाल बिहारी लाल भी साहित्य

दर्द तो है इस बात का दिल में कि, सांसे देकर धड़कन ने साथ छोड़ दिया ।

 

प्रिया मिश्रा कुछ खूबसूरत लम्हों ने साथ छोड़ दिया कि हसीं ख्वाबों ने साथ छोड़

अगर बचानी बेटियां, करें आज संकल्प । बेटी का जग में नहीं, कोई और विकल्प ।

 

बेटी है इक्कीस डा. रामनिवास ‘मानव’ बेटा–बेटी में नहीं, कहने को कुछ भेद । मरती

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